76. भाई संगत सिंघ छाबड़ा जी
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नामः भाई संगत सिंघ छाबड़ा जी
चमकौर की गढ़ी में शहीद होने वाले आखरी सिक्खों में से एक थे।
आप गुरू साहिब जी की फौज के एक मुख्य जरनैल थे।
उनका पिछोकड़ पटटी (पहले जिला लाहौर, अब जिला श्री अमृतसर साहिब जी)
कब शहीद हुएः 23 दिसम्बर 1705
कहाँ शहीद हुएः चमकौर की गढ़ी
किसके खिलाफ लड़ेः मुगलों के
अन्तिम सँस्कार का स्थानः चमकौर की गढ़ी
अन्तिम सँस्कार कब हुआः 25 दिसम्बर 1705
भाई संगत सिंघ छाबड़ा जी ने 23 दिसम्बर 1705 वाले दिन सुबह के
समय मुगल फौजों का सामना करते हुए शहीदी जाम पीया था। वो चमकौर की गढ़ी में शहीद होने
वाले आखरी सिक्खों में से एक थे। भाई संगत सिंघ छाबड़ा जी गोत्र के अरोड़ा सिक्ख थे।
उनका पिछोकड़ पटटी (पहले जिला लाहौर, अब जिला श्री अमृतसर साहिब जी) आप श्री गुरू
गोबिन्द जी खास दरबारी सिक्खों में से एक थे। भाई संगत सिंघ छाबड़ा जी गुरू साहिब जी
की फौज के एक मुख्य जरनैल थे। उन्होंने श्री आनँदपुर साहिब जी और निरमोहगढ़ की लड़ाईयों
में हमलावरों को योजना अनुसार आगे आने से रोका और दो-दो हाथ दिखाकर खूब दौड़ा-दौड़ाकर
मारा था। श्री आनँदपुर साहिब जी में रहते हुए सिक्खों को बिलासपुर के राजा अजमेरचँद
के साथ कई बार दो-दो हाथ करने पड़े थे। मई 1705 में पहाड़ी और मुगल सेनाओं ने पुरी
तरह से चारों ओर से घेर लिया तो यह घेरा लगभग 7 महीने तक रहा। 20 दिसम्बर 1705 को
जब गुरू साहिब जी ने श्री आनँदपुर साहिब जी छोड़ने का निर्णय लिया तो गुरू साहिब जी
के साथ जीने-मरने की कसम खानें वाले 39 ओर सिक्खों के साथ आप भी थे। इन 40 सिक्खों
को श्री आनँदपुर साहिब जी के 40 मुक्ते कहकर सम्बोधित किया जाता है। गुरू साहिब जी
के साथ यह कोटला निहँग से होते हुए श्री चमकौर साहिब जी पहुँचे। सारे के सारे सिक्ख
थके हुए थे। सभी ने बुधीचँद रावत की गढ़ी में डेरा डाल लिया। दूसरी ओर किसी चमकौर
निवासी ने यह जानकारी रोपड़ जाकर वहाँ के थानेदार को दे दी। इस प्रकार मुगल फौजें
चमकौर की गढ़ी में पहुँच गईं। सँसार का सबसे अनोखा युद्ध आरम्भ हो गया। जबकि मुगलों
की गिनती लगभग 10 लाख के आसपास थी। कुछ ही देर में जबरदस्त लड़ाई शुरू हो गई। सिक्खों
ने गुरिल्ला लड़ाई का सहारा लिया। सिक्ख पाँच-पाँच का जत्था लेकर गढ़ी में से निकलते
और लाखों हमलावरों के जूझते और तब तक जूझते रहते जब तक कि शहीद नहीं हो जाते। शाम
तक बहुत से सिक्ख शहीद हो चुके थे। साहिबजादा अजीत सिंघ जी और साहिबजादा जुझार सिंघ
जी भी शहीदी पा गए थे। रात होने तक 35 सिक्ख शहीद हो चुके थे। इनमें भी शामिल थे।
इन शहीदों का अन्तिम सँस्कार इसी स्थान पर 25 दिसम्बर 1705 वाले दिन किया गया। अगले
दिन सूर्य उदय होते ही बाकी के सिक्ख भी शहीद हो गए, जिसमें भाई संगत सिंघ छाबड़ा जी
भी शामिल थे। इन शहीदों का अन्तिम सँस्कार इसी स्थान पर 25 दिसम्बर 1705 वाले दिन
किया गया।