सलोक महला ५ ॥ तेरा कीता जातो नाही मैनो जोगु कीतोई ॥ मै निरगुणिआरे को गुणु नाही आपे तरसु पइओई ॥ तरसु पइआ

मिहरामति होई सतिगुरु सजणु मिलिआ ॥ नानक नामु मिलै तां जीवां तनु मनु थीवै हरिआ ॥१॥ (बाणी श्री गुरू अरजन देव जी) 

 
 
एम पी-3 श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी

श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी (गुरूबाणी) हिन्दी में और पाठ करने का सरल तरीका

तिलक और जनेऊ की खातिर शहीदी की सबसे अनौखी दास्तान
12 बजे वाला असली किस्सा (अब्दाली द्वारा दिल्ली तथा अन्य नगरों को लूटना)
अनौखा युद्धः 43 बनाम 1000000  (दस लाख)
जिनकी शहादत के समय अभी दूध के दाँत भी नहीं गिरे थे
एक हाथ में सिर और एक हाथ में तलवार लेकर लड़ने वाला वीर योद्धा
ग्वालियर का बड़ा नक्शा और गुरूद्वारा श्री दाता बन्दी छौड़ साहिब पहुँचने का रास्ता
पहले गुरू श्री गुरू नानक देव जी (गुरू जी का प्रारम्भिक जीवन)
पहले गुरू श्री गुरू नानक देव जी (पहली प्रचार यात्रा या पहली उदासी)
पहले गुरू श्री गुरू नानक देव जी (दूसरी प्रचार यात्रा या दूसरी उदासी) 
पहले गुरू श्री गुरू नानक देव जी (तीसरी प्रचार यात्रा या तीसरी उदासी)
पहले गुरू श्री गुरू नानक देव जी (चौथी प्रचार यात्रा या चौथी उदासी)
दुसरे गुरू श्री गुरू अंगद देव जी तीसरे गुरू श्री गुरू अमरदास जी
चौथे गुरू श्री गुरू रामदास जी पाँचवें गुरू श्री गुरू अरजन देव जी
छठवें गुरू श्री गुरू हरगोबिन्द साहिब सातवें गुरू श्री गुरू हरिराये साहिब जी
आठवें गुरू श्री गुरू हरिक्रिशन साहिब नौवें गुरू श्री गुरू तेग बहादर साहिब
दसवें गुरू श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी  

भक्त बाणी के विरोधी और उनकी विरोधता का स्पष्टीकरण के साथ मुँहतोड़ जबाब

सिक्खी प्रश्न और उत्तर, भाग1 (प्रश्न 1 से प्रश्न 400 तक)
सिक्खी प्रश्न और उत्तर, भाग2 (प्रश्न 401 से प्रश्न 800 तक)
सिक्खी प्रश्न और उत्तर, भाग3 (प्रश्न 801 से प्रश्न 1200 तक)
सिक्खी प्रश्न और उत्तर, भाग 4 (प्रश्न 1201 से प्रश्न 1600 तक)
सिक्खी प्रश्न और उत्तर, भाग5 (प्रश्न 1601 से प्रश्न 1927 तक)

श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी इतिहास

 काव्य रूपों की जानकारी  
विशेष शीर्षक बाणियाँ महत्वपूर्ण शीर्षक
एम पी-3 श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी गुरूबाणी के 31 राग
श्री गुरू ग्रँथ साहिब जी (गुरूबाणी) की हिन्दी में सम्पूर्ण व्याख्या
भक्त श्री कबीरदास जी भक्त श्री रविदास जी
भक्त श्री नामदेव जी भक्त श्री शैख फरीद जी
भक्त श्री पीपा जी भक्त श्री जैदेव जी
भक्त श्री रामानन्द जी भक्त श्री बैनी जी
भक्त श्री त्रिलोचन जी भक्त श्री परमानन्द जी
भक्त श्री भीखन जी  भक्त श्री सैन जी
भक्त श्री धन्ना जी भक्त श्री सधना जी
भक्त श्री सुरदास जी इतिहासिक गुरूद्वारे
संत बाबा श्री नंद सिंघ जी भाग-1  संत बाबा श्री नंद सिंघ जी भाग-2
संत बाबा श्री नंद सिंघ जी भाग-3 संत बाबा श्री नंद सिंघ जी भाग-4
संत बाबा श्री नंद सिंघ जी भाग-5 संत बाबा श्री ईशर सिंघ जी
छठवें गुरू श्री गुरू हरगोबिन्द साहिब जी के समय के शहीद

 नौवें गुरू श्री गुरू तेग बहादर साहिब  जी के समय के शहीद

श्री आनंदपुर साहिब और श्री चमकौर साहिब जी के 40 मुक्ते
दसवें गुरू श्री गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब जी के समय के शहीद (भाग-1)
दसवें गुरू श्री गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब  जी के समय के शहीद (भाग-2)
श्री मुक्तसर साहिब जी के 40 मुक्ते   आलोवाल के 40 मुक्ते
18 वीं शताब्दी के शहीद

अन्य शहीद

पाँच मुक्ते पाँच प्यारे
4 साहिबजादे  
छोटा घल्लूघारा (विपत्तीकाल) बड़ा घल्लूघारा (महाविनाश)
सरदार नवाब कपूर सिंघ जी बाबा बन्दा सिंह बहादुर जी
प्रसिद्ध सिक्ख युद्ध और लड़ाईयाँ सरदार जस्सा सिंह आहलुवालिया
श्री दरबार साहिब को अपवित्रत करने वाले मस्सा रंघण का सिर काटने वाले वीर
 पँजाब के राज्यपाल अब्दुलसमद खान की सिक्खों के विरूद्ध नीति
पँजाब के राज्यपाल जकरिया खान की सिक्खों के विरूद्ध नीति
नादिरशाह दुर्रानी का भारत पर हमला और सिक्खों की नीति
पँजाब के राज्यपाल यहिया खान की सिक्खों के विरूद्ध नीति
पँजाब के राज्यपाल मीर मन्नू द्वारा सिक्ख जनता का नरसँहार
 अहमदशाह अब्दाली द्वारा भारत पर 8 हमले और सिक्खों की नीति
प्रसिद्ध साखियाँ (शिक्षाएँ) भाग-1 प्रसिद्ध साखियाँ (शिक्षाएँ) भाग-2
प्रसिद्ध साखियाँ (शिक्षाएँ) भाग-3 प्रसिद्ध साखियाँ (शिक्षाएँ) भाग-4
प्रसिद्ध साखियाँ (शिक्षाएँ) भाग-5 प्रसिद्ध साखियाँ (शिक्षाएँ) भाग-6
सिक्ख मिसलें महाराजा रणजीत सिंघ जी
प्रसिद्ध सिक्ख महिलाएँ शहीद सरदार भगत सिंघ जी
11, भट्ट साहिबान 4, गुरूसिक्ख साहिबान 
पाँच तखत भाई गुरदास जी
समस्त इतिहासिक गुरूद्वारों के बैनर हिन्दी इतिहास में डाऊनलोड करें
फोटो गैलरी (गुरू साहिबानों से संबंधित अनमोल वस्तुएँ)
 गुरूबाणी बैनर गैलेरी-1  गुरूबाणी बैनर गैलेरी-2
 गुरूबाणी बैनर गैलेरी-3  गुरूबाणी बैनर गैलेरी-4
 गुरूबाणी बैनर गैलेरी-5  गुरूबाणी बैनर गैलेरी-6
 गुरूबाणी बैनर गैलेरी-7  गुरूबाणी बैनर गैलेरी-8
 गुरूबाणी बैनर गैलेरी-9  गुरूबाणी बैनर गैलेरी-10
   
   
एम पी-3 श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी
श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी (गुरूबाणी) हिन्दी में और पाठ करने का सरल तरीका
   
 
 

 

 

 
पाँचवे पातशाह श्री गुरू अरजन देव साहिब जी की शहीदी के पश्तात बदली हुई स्थि‌ति के अनुसार जब बाबा बुडडा जी द्वारा छठवें गुरू श्री गुरू हरिगोबिन्द साहिब जी को मीरी पीरी राजसी एवं आध्यात्मिक की दो तलवारें पहनाकर गुरू गद्दी पर बैठाया गया तत्पश्चात गुरू जी की बढ़ रही सैनिक शक्ति आम जनता में बढ़ रही उपमा व लोहगढ़ के किले के निमार्ण के साथ-साथ श्री अकाल तखत साहिब जी में जनता की‌ शिकायतों का त्वरित निराकरण करके गुरू साहिब जी ने उचित न्याय देना प्रारम्भ किया। तब ऐसी गतिविधियों द्वारा गम्भीर नोटिस लिया गया एवं जहाँगीर के पास खतरे की झूठी रिपोर्ट भिजवाई गई। मुगल सम्राट जो पहले से ही गुरू घर के प्रति खफा था। उसने गुरू महाराज को आगरा में मिलने का सन्देश भेजा। चन्दूशाह को बहुत चिन्ता हुई। उसने राजकीय ज्योतिषी को अपने विश्वास में लिया और उसे 5000 रूपये देने निश्चित किये, जिसके अर्न्तगत वह सम्राट को भ्रम में डालेगा कि उस पर भारी विपत्ति आने वाली है क्योंकि उसके पक्ष में ग्रह नक्षत्र और इस सँकट को टालने का एक ही उपाय है कि कोई महान विभूति उसके पक्ष में 40 दिन अखण्ड जप करे।

वास्तव में जहाँगीर हिन्दु सँस्कारों में पला हुआ व्यक्ति था, उसकी किशोर अवस्था राजस्थान के राजपूत घरानों  (ननिहाल) में व्यतीत हुई थी। अतः वह पंडितों ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ा रहा था। राजकीय ज्योतिषी ने चन्दूशाह का काम कर दिया। सम्राट उसके भ्रमजाल में फँस गया। इस प्रकार सम्राट बैचेन रहने लगा कि उसका कुछ अनिष्ट होने वाला है। दरबार में मँत्रियों ने इसका कारण पुछा तो सम्राट ने बताया कि कोई ऐसा व्यक्ति ढूँढो जो मेरे लिए जप-जप किसी सुरक्षित स्थान में करे।

यह सुनते ही चन्दूशाह ने विचार रखा। इन दिनों आपके साथ ही तो हैं गुरू नानक देव जी के उत्तराधिकारी, उनसे महान और कौन हो सकता है, वही इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति हैं। बादशाह ने गुरू जी को तुरन्त बुला भेजा, गुरू जी ने बादशाह को बहुत समझाने का प्रयास किया कि ग्रह-नक्षत्रों का भ्रमजाल मन से निकाल दो। आपके जीवन में किसी प्रकार की विपक्ति नहीं आने वाली है किन्तु वह हठ करने लगा कि नहीं कृप्या आप मेरे लिए 40 दिन अखण्ड घोर तपस्या करें। गुरू जी ने यह कार्य करना स्वीकार कर लिया। (जबकि कुछ इतिहासकार लिखतें हैं कि जहाँगीर ने गुरू जी को निमँत्रण देकर अपने पास बुलाया और धोखे से गिरफ्तार करके ग्वालियर के किले में भेज दिया गया)। ग्वालियर के किले में पहले से ही बहुत सारे हिन्दु राजा कैद थे।

गुरू जी के नूरानी प्रभाव से सभी राजा प्रसन्न और अत्यन्त प्रभावित हुए। गुरू जी के नजरबन्द होने से आम सिक्ख संगतों में चिन्ता बढ़ रही थी। बाबा बुडडा जी व भाई गुरदास जी के योग्य नेतृत्व में गुरू जी का पता लगा लिया गया। और सुबह शाम प्रभात फेरी प्रारम्भ की गई। जिससे सभी सिक्ख संगतों की हिम्मत बढ़ गई। (नोटः प्रभात फेरी की सबसे पहली चौकी ग्वालियर से मानी गई है। जिस स्थान पर अब गुरूद्वारा श्री दाता बन्दी छोड़ साहिब है)।

कई पराक्रमी सिक्ख ग्वालियर पहुँचते और किले की तरफ शीश झुकाते माथा टेकते और परिक्रमा करके वापिस लौट जाते। सामान्य तौर पर जहाँगीर कुछ भ्रमित प्रवृति का था। उक्त समय में जहाँगीर कुछ अस्वस्थ एवं परेशान रहने लगा। जिसके कारण उसकी बेगम नूरजहाँ भी उसके स्वास्थ से परेशान हो गई। बेगम नूरजहाँ गुरू घर के परम हितैषी साईं मियाँ मीर जी की मुरीद थी। जब बेगम नूरजहाँ ने साईं मियाँ मीर जी को अपनी परेशानी बताई, तब साईं मियाँ मीर जी ने उन्हें बताया कि जब तब गुरू जी ग्वालियर के किले से रिहा नहीं होंगे, उस समय तक बादशाह जहाँगीर स्वस्थ नहीं हो सकते।

परिणामस्वरूप बेगम द्वारा जहाँगीर को गुरू जी की रिहाई के लिए सहमत करके रि‌हाई संबंधी शाही आदेश भिजवाया गया। इस समय तक सभी कैदी राजाओं की श्रद्धा गुरू जी के प्रति उत्पन्न हो चुकी थी। जब गुरू जी की रिहाई का समाचार मालूम हुआ तो वह सब पहले तो प्रसन्न हुए कि किले से रिहा होने वाले आप प्रथम भाग्यशाली व्यक्ति हैं। तत्पश्चात जल्दी ही उदास हो गए। क्योंकि गुरू जी के पावन वचनों व संगत से वंचित हो जाने के भय से उनको अपनी पहले की दशा की चिन्ता खा रही थी।

गुरू जी को इस चिन्ता की जानकारी मिली तो आपने बादशाह के पास अपनी बात रखी की हम ‌अकेले रिहा नहीं होंगे, साथ में आपको इन ५२ हिन्दू राजाओं को भी रिहा करना होगा। तब जहाँगीर ने देश में अशान्ति और सम्भावित खतरे से चिन्तित होकर यह सोचकर कि राजपूत किसी का पल्ला नहीं पकड़ते, आदेश दिया कि जितने हिन्दू राजा गुरू जी की पल्ला पकड़कर बाहर आ जाऐं, उन्हें कारावास से मुक्त कर दिया जाऐगा।

इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए गुरू जी ने ५२ कलियों वाला एक ऐसा चौला सिलवाया, जिसको पकड़कर ५२ हिन्दू राजा बन्दी छोड़ का जयघोष करते हुए किले से रिहा हुए। वर्तमान में यह चौला गुरू घुड़ाणी कलाँ पायल जिला ‌लुधियाना में सुशोभित है। दाता बन्दी छोड़ शब्द सबसे पहले ग्वालियर किले के दरोगा हरिदास द्वारा उपयोग किये गए थे। गुरू जी यहाँ पर २ वर्ष और ३ माह तक नजरबन्द रहे।
 

गुरूद्वारा श्री दाता बन्दी छोड़ साहिब फोन नम्बर: 0751-2480040

 

 

दाताबन्दी छौड़ दिवस उस दिन को माना जाता है, जब छठवें गुरू श्री गुरू हरिगोबिन्द साहिब जी ग्वालियर के किले से रिहा हुए और साथ में 52 हिन्दू राजाओं को भी रिहा किया। इस दिन असू की अमावस्या होती है। और जब गुरू जी श्री अमृतसर साहिब जी पहुँचे तब दीवाली थी और गुरू जी के स्वागत में दीपमाला की गई।

 

 

मीरी: मीरी वो तलवार है, जो शरीरक तौर पर धारण की जाती है। श्री गुरू हरिगोबिन्द साहिब जी ने धर्म के दुशमनों का नाश करने के लिए इसे धारण किया था।

पीरी: पीरी वो तलवार है, जो आत्मिक और आध्यात्मिक तौर पर धारण की जाती है। इसे आध्यात्मिक ज्ञान और गुरबाणी के ज्ञान की तलवार भी कहा जा सकता है, क्योंकि इससे शरीर के अन्दर के राक्षसों का खात्मा किया जाता है। श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी में अंग 1414 लाइन 6 में लिखा हैः

।। गिआन खड़ग पंच दूत संघारे गुरमति जागै सोई ।।

 

 
1. धर्म की कमाई करनी।

2. दसवँत देना (कमाई का दसवाँ भाग दान-पुन्य में देना)।

3. गुरबाणी याद करनी।

4. अमृत समय (ब्रहम समय) में जागना।

5. प्यार से गुरूसिक्खों की सेवा करनी।

6. गुरूखिक्खों से गुरबाणी के अर्थ समझने।

7. पाँच कँकारों की पक्की रहित रखनी।

8. शब्द कीर्तन (गुरबाणी) का अभ्यास करना।

9. ध्यान सत-स्वरूप सतिगुरू का करना।

10. सतिगुरू श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी को मानना।

11. सभी कार्यों के आरम्भ के समय अरदास करनी।

12. जन्म, मरन, विवाह, आनन्द आदि के समय श्री जपुजी साहिब जी का पाठ करके कढ़ाह प्रसाद तैयार करके श्री अनंद साहिब जी का पाठ, अरदास करके पाँच प्यारों और हजूरी ग्रन्थी सिंघों आदि को वरताने के बाद संगत को देना।

13. जब तब कढ़ाह प्रसाद बँट रहा हो, तब तक सारी संगत अडोल बैठी रहे।

14. विवाह किये बिना किसी प्रकार का शारीरिक संबंध नहीं रखना।

15. पर नारी को माँ, बहिन, बेटी की तरह मानना।

16. किसी स्त्री को गाली नहीं देना।

17. जगत झूठः तम्बाकू और मीट नहीं खाना।

18. रहितवान और नाम जपने वाले गुरूसिक्खों की संगत करनी।

19. जितने काम अपने स्वयं के करने वाले हों, उनके प्रति आलस नहीं करना।

20. गुरबाणी का कीर्तन और कथा रोज सुनना और करना।

21. किसी की निन्दा चुगली नहीं करनी, किसी से घृणा नहीं करनी।

22. धन, जवानी कुल और जात का अभिमान नहीं करना।

23. अपनी मत ऊँची से ऊँची रखनी।

24. शुभ करम करते रहना।

25. दिमाग और बल का दाता केवल वाहिगुरू (ईश्वर, परमात्मा) जी को ही जानना।

26. कसम खाने वाले पर ऐतबार नहीं करना।

27. स्वतँत्र रहना।

28. राजनिति भी पढ़ना, जानकारी रखना।

29. शत्रु के साथ साम, दाम और भेद आदि उपाय अपनाने के बाद यु़द्ध करना धर्म है।

30. शस्त्र विद्या और घुड़-सवारी का अभ्यास करना।

31. दूसरे मतों की पुस्तकें, विद्या पढ़नी लेकिन पक्का विश्वास केवल गुरबाणी और परमात्मा (वाहिगुरू) जी पर ही रखना।

32. गुरू का उपदेश धारण करना।

33. श्री रहिरास साहिब जी का पाठ करके खड़े होकर अरदास करनी।

34. सोते समय श्री र्कीतन सोहिले साहिब जी का पाठ करना।

35. बालों को नँगा नहीं रखना।

36. सिक्खों, सिंघों का पूरा नाम लेकर बुलाना, आधा नहीं।

37. शराब नहीं पीनी।

38. बाल कटें लोगों के यहाँ कन्या नहीं देनी, कन्या उस घर में देनी जहां पर परमात्मा (अकाल पुरूख) की सिक्खी हो।

39. सभी काम, श्री गुरू ग्रन्थ साहिब की आज्ञा और गुरबाणी अनुसार की करने हैं।

40. चुगली करके किसी का काम नहीं बिगाड़ना।

41. कड़वे वचन बोलकर किसी का दिल नहीं दुखाना।

42. दर्शन यात्रा, गुरूद्वारों की ही करनी।

43. किसी को वचन देकर उसे पूरा करना।

44. अतिथी, परदेसी, जरूरतमँद, दुखी, अपँग की यथासम्भव सहायता करनी।

45. लड़की की कमाई को पाप मानना।

46. दिखावे का सिक्ख नहीं बनना।

47. सिक्खी बालों के साथ निभानी। बालों को गुरू समान जानकर अदब करना।

48. चोरी नहीं करना, चोरी में शामिल भी नहीं होना, ठगी, धोखा, दगा नहीं करना।

49. गुरूसिक्ख का विश्वास करना।

50. झूठी गवाही नहीं देनी।

51. झूठ नहीं बोलना।

52. लंगर और प्रसाद सभी तरफ एक जैसा बाँटना।