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115. श्री गुरू हरिकिशन जी दिल्ली पधारे

(महापुरूषों की कभी परीक्षा नहीं लेनी चाहिए। उनसे तो कुछ भी छिपा नहीं होता। वह तो आपके मन की भी बात जान सकते हैं।)

श्री गुरू हरिकिशन जी की सवारी जब दिल्ली पहुँची तो राजा जयसिँह ने स्वयँ उनकी आगवानी की और उन्हें अपने बँगले में ठहराया। जहाँ उनका भव्य स्वागत किया गया। राजा जय सिँह के महल के आसपास के क्षेत्र का नाम जयसिँहपुरा था। जयसिँह की रानी के हृदय में गुरूदेव जी के दर्शनों की तीव्र अभिलाषा थी, किन्तु रानी के हृदय में एक सँशय ने जन्म लिया। उसके मन में एक विचार आया कि यदि बालगुरू पूर्ण गुरू हैं तो मेरी गोदी में बैठे। उसने अपनी इस परीक्षा को किर्यान्वित करने के लिए बहुत सारी सखियों को भी आमँत्रित कर लिया था। जब महल में गुरूदेव का आगम हुआ तो वहाँ बहुत बड़ी सँख्या में महिलाएँ सजधज कर बैठी हुई गुरूदेव जी की प्रतीक्षा कर रही थीं। गुरूदेव सभी स्त्रियों को अपनी छड़ से स्पर्श करते हुए कहते गये कि यह भी रानी नहीं, यह भी रानी नहीं, अन्त में उन्होंने रानी को खोज लिया और उसकी गोद में जा बैठे। तद्पश्चात् उसे कहा– आपने हमारी परीक्षा ली है, जो कि उचित बात नहीं थी। औरँगजेब को जब सूचना मिली कि आठवें गुरू श्री हरिकिशन जी दिल्ली राजा जयसिँह के बँगले पर पधारे हैं तो उसने उनसे मुलाकात करने का समय निश्चित करने को कहा– किन्तु श्री हरिकिशन जी ने स्पष्ट इन्कार करते हुए कहा– हमने दिल्ली आने से पूर्व यह शर्त रखी थी कि हम औरँगजेब से भेंट नहीं करेंगे। अतः वह हमें मिलने का कष्ट न करें। बादशाह को इस उत्तर की आशा नहीं थी। इस कोरे उत्तर को सुनकर वह बहुत निराश हुआ और दबाव डालने लगा कि किसी न किसी रूप में गुरूदेव को मनाओं, जिससे एक भेंट सम्भव हो सके।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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