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111. पतिव्रता रजनी

(कभी-कभी सच्ची श्रद्धा और परमात्मा के प्रति सच्ची लग्न ऐसा रंग लाती है कि सबकी आँखें चकाचौंध हो जाती हैं।)

पँजाब के पट्ठी नगर के जागीरदार दुनीचँद की पाँच पुत्रियाँ थीं, इसलिए उसके मन में एक पुत्र की अभिलाषा रहती थी। इसके लिए उनसे कई अनुष्ठान करवाए, किन्तु उसे निराशा ही हाथ लगी, पुत्र के स्थान पर पुत्री ही जन्म लेती रही अतः उसका भगवान से विश्वास उठ गया और वह नास्तिक हो गया। उसने क्षमता के अनुसार चार पुत्रियों का विवाह कर दिया। जब छोटी पुत्री के वर की खोज हो रही थी तो उन दिनों उसकी अन्य पुत्रियाँ मायके आई हुई थीं। वे सभी मिलकर अपने पिता की प्रशंसा कर रही थीं– कि वह बहुत बड़ा दाता है, उसने विवाह पर सभी पुत्रियों को वह सब कुछ दिया है, जो अन्य राजा-महाराजा भी नहीं दे सकता था। इस पर छोटी लड़की जो अभी कुँवारी थी ने कहा– यह सत्य नहीं है, सब कुछ देने वाला तो वह भाग्य विधाता यानि की परमात्मा है, हमारे पिता तो केवल एक साधन मात्र हैं। इस पर अन्य बहने सहमत नहीं हुईं और उनमें मतभेद हो गया। और सब बहने कहने लगी की यह पिता के उपकार नहीं मानती, इसलिए हमें इसका बहिष्कार करना चाहिए। यह बात जब पिता जगीरदार दुनीचँद को मालूम हुई तो वह छोटी बेटी रजनी पर बरस पड़ा और कहने लगा– मैंने तुम्हें बेटों की तरह पाला है और हर प्रकार की सुख सुविधा जुटा कर दी है परन्तु एक तुम हो कि नमक हराम जैसी बातें कर रही हो, मैं तुम्हे और तेरे भगवान को देख लूँगा वह तुम्हारा किसी प्रकार पालन पोषण करता है। रजनी पिता के क्रोध से विचलित नहीं हुई, क्योंकि वह नित्य साध-संगत में जाती थी और वहां गुरूबाणी श्रवण करती थी और अध्ययन करती रहती थी। उसके दिल में पूर्ण आस्था थी कि सब देने वाला परमात्मा ही है, अन्य प्राणी तो केवल साधन मात्र हैं। जैसेः

कोऊ हरि समान नहीं राजा ।।
ए भूपति सभि दिवस चारि के झूठे करत दिवाजा ।।

रजनी को गुरूबाणी का पूर्ण भरोसा था वह अपनी विचारधारा पर दृढ़ रही अतः पिता ने क्रोध में आकर उसका विवाह एक कुष्ट रोगी के साथ कर दिया। अब रजनी अपने कुष्टी विकलाँग पति को एक छोटी की गाड़ी में बिठाकर एक रस्सी के खींचते हुए गाँव-गाँव नगर-नगर घूमने लगी और भिक्षा माँगकर गुजर बसर करने लगी इस प्रकार उसके कई दिन बीत गये। एक दिन वह घूमते-घूमते नये नगर के बाहर निर्माणधीन सरोवर के किनारे विश्राम करने लगी, उसने पति को बेरी के वृक्ष की छाया में बिठा दिया और नगर में भिक्षा के लिए गई। उसके जाने के बाद जब उसके पति ने देखा कि कुछ पक्षी बेर के वृक्ष पर बैठे हुए हैं और वह बारी-बारी वृक्ष से उतरकर सरोवर के जल में डुबकी लगाते हैं और जब बाहर निकलते हैं तो उनका काला रग सफेद यानि वो हँस रूपी पक्षी में परिवर्तित हो जाते हैं। सरोवर के जल में चमत्कारी शक्ति को देखकर उसके मन में अभिलाषा उठी कि क्यों न वह इस सरोवर में स्नान करके देख ले, शायद मेरे कुष्ट रोग का नाश हो जाए। यह विचार आते ही उसने बल लगाकर धीरे-धीरे रंगते हुए सरोवर में जाकर डूबकी लगाई। प्रकृति का आश्चर्यजनक चमत्कार हुआ और क्षण भर में कुष्टी पूर्ण निरोग पुरूष में परिवर्तित हो गया। अब वह रजनी के लौटने की प्रतीक्षा करने लगा। जब रजनी वापिस आई तो उसने वहां कुष्टी पति को न पाकर एक स्वस्थ युवक को देखा जो अपने आपको उसका पति बता रहा था, तो रजनी को यकीन नहीं हुआ और वह उस पर अपने पति को लापता करने का आरोप लगाने लगी। दोनों में इसी बात पर भँयकर तकरार प्रारम्भ हो गई। जिसे सुनकर नगरवासी एकत्र हो गए। इस झगड़े का न्याय जन-साधारण के बस का नहीं था अतः उन्होंने सुझाव दिया आप दोनों बाबा बुड्डा जी के पास जाए, क्योंकि वही इस सरोवर के कार्य की देखभाल कर रहे हैं। ऐसा ही किया गया। बाबा बुड्डा जी ने दोनों की बात घ्यान से सुनी और युवक से कहा– ध्यान से देखो कहीं पुराना कुष्ट रोग कहीं बाकी रह गया हो। युवक ने बताया– कि "दाहिने हाथ की उँगलियों" के आगे का भाग अभी भी कुष्ट से प्रभावित है, क्योंकि इस हाथ से एक झाड़ी को पकड़कर डूबकी लगाई थी। बाबा बुड्डा जी उन दोनों को उस स्थान पर ले गये और युवक को हाथ सरोवर में डालने के लिए कहा– देखते ही देखते बाकी के कुष्ट के चिन्ह भी लुप्त हो गये। यह प्रमाण देखकर रजनी सन्तुष्ट हो गई और वह दोनों सहर्ष जीवन व्यतीत करने लगे। यह स्थान दुख भँजनी बैरी के नाम से जाना जाता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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