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90. बीरबल का गुरू जी से मतभेद

(महापुरूषों से कभी भी हठधर्मी से बात नहीं की जाती और ना ही उनके सामने अकड़कर जाना चाहिए। उनके सामने तो विनम्र बनकर ही जाना चाहिए।)

बीरबल भट समुदाय से एक राजस्थानी पण्डित था। राजा मान सिंह ने इस चतुर व्यक्ति का परिचय अकबर से करवाया। अकबर इस व्यक्ति की तीक्ष्ण बुद्धि से बहुत प्रभावित हुआ और उसने बीरबल को अपने रतनों में शामिल करके इसें नौवें रतन की उपाधि से सम्मानित किया। प्राचीनकाल में भट कवियों को राजा–महाराजाओ के दरबार में कविता पाठ अथवा अन्य क्रायक्रमो को प्रदर्शन उपहार स्वरूप धन की प्राप्ति होती थी। सर्वप्रथम बीरबल की जीविका का यही एकमात्र साधन था। इनका ध्यान अपने जजमान को प्रसन्न करने पर ही केन्द्रित रहता था जो कि इनके सँस्कारों में इसे विरासत में मिला एक विशेष प्रकार का स्वभाव था। राजदरबार में सभी को प्रसन्न करने की चेष्टा में नई–नई बाते करना इनका मुख्य कार्य था। एक दिन सम्राट अकबर, बीरबल के किसी चुटकले पर प्रसन्न हुए। तो उन्होंने बीरबल से कहाः आज कुछ माँग लो। इस पर बीरबल ने वही विरासत में मिली आदत अनुसार माँग लियाः कि मुझे स्वर्ण हिन्दु परिवारों के विवाह पर पाँच रूपये प्रति विवाह मोख वसूल करने का अधिकार प्राप्त होना चाहिए। सम्राट अकबर ने अनुमति दे दी। इस प्रकार बीरबल प्रशासनिक शक्ति से कर के रूप में अपने लिए बहुत भारी धनराशि इक्टठी करने में सफल होने लगा। उन्हीं दिनों बलोचिस्तान के कबैली क्षेत्र में विद्रोह फैल गया। सम्राट अकबर ने विद्रोह का दमन करने के लिए सेना भेजी, किन्तु वह असफल रहा। फिर उसने बीरबल के नेतृत्व में और कुमुद भेजी। बीरबल जब गोइँदवाल साहिब पहुँचा तो उसको वहाँ श्री गुरू अमरदास जी की कीर्ति सुनने को मिली। उसके मन में विचार आया कि यहां गुरू अमरदास जी का जनता में मान–सम्मान है। अतः इन्हीं के माध्यम से लोगों में अपने लिए पाँच रूपये प्रति विवाह के हिसाब से मोख रूप में एकत्र करने में सफलता प्राप्त करूँ। बीरबल ने गुरू जी को सँदेश भेजाः कि मुझे अधिकार प्राप्त है कि मैं स्वर्ण वर्ण के हिन्दुओं से जजिया के रूप में पाँच रूपये प्रति परिवार उगाह सकता हूं। अतः आप मेरी इस कार्य में सहायता करें और मुझे अपने सेवकों से धन इकटठा करके दें। उत्तर में गुरू जी ने सन्देश भेजाः कि यह फकीरों का दर है, यहाँ से आप बलपूर्वक कुछ भी नहीं प्राप्त कर सकते। पहली बात तो यह है कि हम हिन्दू नहीं हैं क्योंकि हम वर्ण आश्रम को नहीं मानते। दूसरी बात यह है कि हम जजिये को गरीबों का शोषण समझते हैं। अतः आपको इस प्रकार के निराधार कर अथवा महसूल को कदाचित नहीं देंगे। हाँ यदि नम्र बनकर लंगर में भोजन करना चाहो तो आपका सभी सेना सहित स्वागत है। यह दो टूक उत्तर सुनकर बीरबल का माथा ठनका।

उसने निर्णय लिया कि चलो सेना को भोजन करवाकर देख लेते हैं। इतनी बड़ी सेना के लिए खाद्यान कहाँ से लायेंगे। इस प्रकार रात्रि के भोजन के समय समस्त सेना की टुकड़ी, जिनकी संख्या हजारों में थी, लंगर में प्रवेश कर गई और भोजन के लिए पँक्तियों में सज गई। जैसे ही गुरू जी को संदेश मिला वह स्वयँ लँगर में पधारे और उन्होंने अपने हाथों से लँगर वितरण में सहायता प्रारम्भ कर दी। बस फिर क्या था, प्रकृति से ऐसी बरकत मिली कि भोजन समाप्त होने पर ही नहीं आया। सभी ने मन इच्छित भोजन किया, किन्तु भण्डार वैसा का वैसा ही रहा। यह आर्श्चजनक कौतुक देखकर सभी मन ही मन प्रसन्न हुए। परन्तु बीरबल को किसी ने बहका दियाः इनके पास एक विशेष रसायन है जिससे स्वर्ण तैयार करते हैं और उसी धन के बल पर यह लँगर चलाते हैं। इस पर बीरबल ने तथाकथित रसायन की माँग कर दीः कि आप हमें वह रसायन दें जिससे आप स्वर्ण तैयार करते हैं। उत्तर में गुरू जी ने कहाः हमारे पास तो केवल प्रभु नाम रूपी रसायन है, जिसकों पी कर सदैव हर्ष–उल्लास में रहता है और उसकी सभी तृष्णाएँ भी समाप्त हो जाती हैं। यदि तुम्हें इच्छा हो तो वह तुम्हें दे सकते हैं। यह उत्तर सुनकर बीरबल बौखला गया और कहने लगाः आप मेरी शक्ति का अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं। मैं चाहूँ तो सभी कुछ बलपूर्वक प्राप्त कर सकता हूं। गुरू जी ने कहाः वह समय कभी नहीं आयेगा। उसी क्षण बीरबल को संदेश मिला कि बहुत जल्दी कबैली क्षेत्र में पहुंचना है, रूको नहीं। बीरबल विवश्ता में आगे बढ़ गया परन्तु कहता गया कि मैं लौटते समय निपट लूँगा। जब यह बात गुरू जी को बताई गई तो उन्होंने कहा वह कभी लौटेगा ही नहीं। बीरबल कबैली क्षेत्र के युद्ध में मारा गया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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