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1. जीवन वृतान्त

  • जन्मः सन 1479
    तीसरे गुरू श्री गुरू अमरदास जी पहले गुरू श्री गुरू नानक देव जी से 10 साल छोटे थे।
    जन्म किस स्थान पर हुआः बासरके, जिला श्री अमृतसर साहिब जी
    माता जी का नामः माता लक्ष्मी
    पिता जी का नामः भाई तेजभान जी
    विवाह कब हुआः सन 1496
    विवाह किससे हुआः मनसा देवी (राम कौर) इन्हें गँगा देवी जी भी कहा जाता था।
    कितनी सन्तान थीः 4 सन्तान, 2 बेटे, 2 बेटियाँ
    सन्तानों का नामः मोहन जी, मोहरी जी, भानी जी, दानी जी
    समकालीन बादशाहः हुमायूँ और अकबर
    गुरू अमरदास के भतीजे की शादी गुरू अंगद देव की बेटी बीबी अमरो जी से हुई थी।
    मन कौनसी बाणी से जागाः श्री जपुजी साहिब जी
    श्री गुरू अंगद देव जी की शरण में कब आएः सन 1541
    जब श्री गुरू अगंद देव जी की शरण में आए तब उम्रः 61 साल
    श्री गुरू अमरदास जी ने गुरू अंगद देव जी को स्नान कराने की सेवा ली।
    श्री गुरू अमरदास जी स्नान कराने के लिए रोज रात को 2 बजे ब्यास दरिया से पानी की गागर भरकर लाते थे।
    तीसरे गुरू कब बनेः 1552 ईस्वी
    कौनसा नगर बसायाः श्री गोइन्दवाल साहिब जी
    श्री गुरू अमरदास जी ने श्री बाउली साहिब जी की निर्माण करवाया था।
    गुरू अंगद देव जी की कितने समय तक सेवा करते रहेः 12 वर्ष
    श्री बाउली साहिब जी का निमार्ण कब करवायाः 1559 ईस्वी
    गुरू अमरदास जी ने पर्दा प्रथा को बन्द करने के लिए कदम उठाए।
    गुरू अमरदास जी ने सती प्रथा के विरूद्ध भी कदम उठाए।
    कितने मँजीदारों को प्रशिक्षण दियाः 146 मँजीदारों को, जिसमें 52 महिलाएँ थीं।
    जोती-जोत कब समाएः 1574 ईस्वी
    जोती-जोत कहाँ पर समाएः श्री गोइन्दवाल साहिब जी

श्री गुरू अमरदास जी का जन्म वैशाख शुदि सम्वत् 1526 विक्रमी (सन् 1479) को पिता तेज भान तथा माता लक्ष्मी के घर में हुआ था। भाई तेजभान बड़े शरीफ और भले इन्सान थे और धार्मिक थे। जिसका प्रभाव गुरू अमरदास जी पर पड़ा। माता जी भी धार्मिक विचारों की थीं। तेज भान अपने ही गाँव में दुकान का काम करते थे। गुरू अमरदास जी भी इसी काम में लग गए। आपका विवाह भाई देवी चंद की सुपुत्री बीबी गँगा देवी के साथ हुआ था। ससुराल के घर का नाम राम कौर करके प्रसिद्ध हुआ। आपके मन में धार्मिक रूचियों का प्रेम आखिरी सीमा तक पहुँच गया। कहते हैं कि आप 21 बार नंगे पाँव हरिद्वार यात्रा को गये थे, जो एक महीने भर में बड़ी मुश्किल से गँगा जी का स्नान करके वापिस आते थे। लेकिन फिर भी मन को शान्ति नहीं मिली। एक समय अमरदास जी हरिद्वार से आ रहे थे कि एक जगह आराम करने बैठ गये। यहाँ पर और भी बहुत से लोग भी आराम कर रहे थे। अमरदास जी के पाँव की तली में पदम का निशान देखकर एक पण्डित ने कहा आपको तो बहुत बड़ा बादशाह या सारे संसार का पूज्य महात्मा बनना चाहिये था। जो निशान आपके पाँव में है, वह निशान श्री कृष्ण जी के पाँव में भी था। यदि अब तक नहीं तो, जल्दी ही आपके सिर पर छत्र झूलेंगे और सँसार की विभूति आपके कदमों में होगी। यह बात सुनकर गुरू अमरदास जी ने पण्डित जी को प्रसाद देना चाहा। तब पण्डित जी बोले कि आपका कोई गुरू है ? तब अमरदास जी ने कहा नहीं, तो पण्डित बोला कि में किसी निगुरे यानि जिसका कोई गुरू ना हो, उसके हाथ का नहीं खाता। तब उसी समय से अमरदास जी ने गुरू की तलाश करनी शुरू कर दी।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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