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1741. गुरूद्वारा श्री मन्जी साहिब, आलमगीर साहिब जी किस स्थान पर सुशोभित है ?

ग्राम आलमगीर, जिला लुधियाना

1742. गुरूद्वारा श्री मन्जी साहिब, आलमगीर साहिब जी का क्या इतिहास है ?

इस स्थान पर श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी सारा परिवार शहीद करवाकर माछीवाड़े से उँचें पीर के रूप में पलँग पर सवार होकर 14 पोह 1761 बिक्रमी (सन् 1704) को यहाँ पहुँचे। इस गाँव के घोड़े के व्यापारी भाई नगारिया सिंघ ने गुरू जी को घोड़ा भेंट किया। गुरू जी ने नबी खाँ, गनी खाँ को पलँग लेकर वापिस भेज दिया। गुरू जी ने गोहे (गोबर के कन्डे) थापती माई से पुछा कि यहाँ पर स्नान करने के लिए जल मिल सकता है, तो माई ने कहा यहाँ पर जल नहीं है। यहाँ से दूर एक कुँआ है, जहाँ पर एक बहुत बड़ी सराल रहती है, वहाँ कोई नहीं जा सकता। गुरू जी ने तीर मारकर सराल की मुक्ति की, वो कुँए में ही गिर गई। सिक्ख पानी लेने गये, तो पानी खराब था। इस कारण गुरू जी जिस स्थान पर बैठे थे, वहाँ धरती में एक तीर मारा, वहाँ से पानी का चश्मा फूट निकला, सिक्खों ने स्नान-पान किया। ये कौहतक देखकर माई गुरू जी के चरणों में गिर पड़ी और बोली कि आप तो कमाल के पीर हो, मुझे कोहड़ है, मैं अनेक इलाज कर चुकी, पर ठीक नहीं होता, आप इसका इलाज करके मेरा दुख दूर करो। गुरू जी ने कहा कि इस पानी के चश्में में जो भी स्नान करेगा, उसके दुख दरिद्र परमात्मा आप ही दूर करेगा। गुरू जी, भाई नगारिया सिंघ के दिये घोड़े से रायकोट की तरफ चले गये। माई ने उस पानी के सम्मे में स्नान किया और बिलकुल ठीक हो गई और गाँव में जाकर सारी घटना ब्यान की। जिस स्थान पर गुरू जी का पलँग, गनी खाँ नबी खाँ ने रखा था, वहाँ सुन्दर छै मन्जिला गुरूद्वारा श्री मंजी साहिब बना हुआ है।

1743. गुरूद्वारा श्री सोमसर साहिब जी किस स्थान पर सुशोभित है ?

ग्राम टिब्बा, जिला लुधियाना

1744. गुरूद्वारा श्री सोमसर साहिब जी का इतिहास से क्या संबंध है ?

यह गुरूद्वारा दसवें गुरू, श्री गुरू गोबिन्द सिंघ साहिब जी की याद में सुशोभित है। श्री आंनदपुर साहिब जी का किला छोड़ने के बाद गुरू जी माछीवाड़े पहुँचे। पठान भाईयों नबी खाँ गनी खाँ को मालूम हुआ कि गुरू जी गुलाबे के घर हैं, तो वो गुरू जी से मिले और बताया कि सारी मुगल सेना आपको ढूँढ रही है। गुरू जी माछीवाड़े से चलकर ऊच कोटि के पीर बनकर गनी खाँ नबी खाँ के साथ इस नगर मे आए। इस नगर में भैंस चरा रहे अयाली से गुरू जी ने जब पानी की माँग की, तो वो ऊँची-ऊँची आवाज में रोने लगा, क्योंकि वहाँ पानी की बहुत कमी थी। गुरू जी ने अपने तीर की नोक से घरती से पानी का सौमा प्रकट किया आप जल पीया और संगतों को पिलाया और बचन किया कि जो भी श्रद्धा के साथ यहाँ स्नान करेगा, उसकी मनोकामना पूरी होगी।

1745. गुरूद्वारा श्री टाहलियाना साहिब जी, लुधियाना में किस स्थान पर सुशोभित है ?

रायकोट सिटी, जिला लुधियाना

1746. गुरूद्वारा श्री गुरू तेग बहादर साहिब जी, भुपल मन्सा किस स्थान पर सुशोभित है ?

ग्राम भुपल, जिला मन्सा (गुरूद्वारा साहिब ग्राम भुपल से आउट साइड पर है। वाया मन्सा-बरनाला रोड, मन्सा से 14 किलोमीटर की दुरी पर है।)

1747. गुरूद्वारा "श्री गुरू तेग बहादर साहिब जी", भुपल मन्सा का इतिहास क्या है ?

जब नवें गुरू, श्री गुरू तेग बहादर साहिब जी इस गाँव में गला से होते हुए आए, तो गाँव के किसी भी बन्दे ने उनकी खातीरदारी नहीं की तो गुरू जी यहाँ से चले गये। लेकिन जब एक रामदोसिया सिक्ख जिसका नाम भाई बिरनदास था, वो गुरू जी के पास भागकर गया और गुरू जी से विनती की, कि मेरे साथ चलें और कुछ समय रूकें। गुरू जी ने उसकी प्रेम भरी विनती कबूल की और एक रात रूकने के लिए तैयार हो गये। भाई बिरनदास जी ने गुरू जी की बहुत खातीरदारी की। गुरू जी ने बिरनदास जी को बहुत से आर्शीवाद दिये।

1748. गुरूद्वारा श्री गुरूसर साहिब जी, पातो हीरा सिंह, ग्राम पातो हीरा सिंह, जिला मोगा किस किस गुरू से संबंधित है ?

4 गुरू साहिबानों से:
गुरू नानक देव जी
गुरू हरगोबिन्द साहिब जी
गुरू हरिराये साहिब जी
गुरू गोबिन्द सिंघ जी

1749. गुरूद्वारा श्री गुरूसर साहिब, पातो हीरा सिंह, ग्राम पातो हीरा सिंह, जिला मोगा में गुरू गोबिन्द सिंघ जी कितनी बार पधारे हैं ?

3 बार :
एक बार श्री दीना साहिब जाते समय
दूसरी बार जब सैर करने के लिए आये
तीसरी बार जब गुरू जी ने 50 सिंघों की भर्ती करके श्री मुक्तसर की पहली लड़ाई की तैयारी की थी, उस समय आये थे।

1750. वह कौनसा स्थान है, जिस स्थान पर श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी ने जाफरनामा लिखा था ?

गुरूद्वारा श्री लोहगढ़ साहिब, जिला मोगा

1751. गुरूद्वारा श्री लोहगढ़ साहिब जी, जिला मोगा से श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी द्वारा लिखा गया जाफरनामा लेकर औरँगजेब के पास कौन गया था ?

भाई दया सिंध जी और भाई धरम सिंघ जी

1752. गुरू गोबिन्द सिंघ जी ने श्री आनंदपुर साहिब के बाद, पहली बार किस स्थान पर खालसा पँथ को जत्थेबँद किया ?

गुरूद्वारा श्री लोहगढ़ साहिब, जिला मोगा

1753. गुरूद्वारा श्री मेहदिआना साहिब किस स्थान पर सुशोभित है ?

ग्राम मेहदियाना, जिला मोगा

1754. गुरूद्वारा श्री मेहदिआना साहिब का इतिहास क्या है ?

दसवें गुरू श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी मुगलराज के समय रायकोट, लम्मे जटपरे और गाँव माँणके की संगतों को निहाल करते हुये यहाँ ढाब महिदेआणा आ पहुँचे, इस ढाब का पवित्र जल देखकर यहाँ पर ठहरे। दो तीन मील तक कोई बसता-बसेरा नहीं था। इस ढाब पर गुरू जी और सिंघों ने दातुन-कुल्ला करके इसनान किया। गुरू जी ने अर्न्तध्यान होकर परमात्मा से बिरती जोड़ी और उनका हुक्म मीठा करके माना। भाई दया सिंघ जी ने विनती की, कि सिंघ और सारा परिवार बिछुड़ गया है, आगे का क्या विचार है। सारी संगत द्वारा विनती करने पर गुरू जी नम्रता से बोले:

सिंघों, गिरते देश को जब कोई सहारा नहीं था, तब पिता को देश पर वारा मैंनें।
माता गुजरी सरहंद गुजरी समय गुजारा, जैसे गुज गया मैं।
चार पुत्र मुझे बख्शे परमात्मा ने, वो भी जोड़ा-जोड़ा करके वारा मैंनें। मुझे शहँशाह ना कहो तुम, किश्तों में कर्जा उतारा मैंनें।

गुरू जी ने नम्रता से कहा संगत, गुरू से बड़ी होती है। कश्मीरी पण्डितों की पुकार पर पिता को दिल्ली भेजा, संगत के कहने पर। आनंदपुर छोड़ा, संगत के कहने पर। चमकौर की गढ़ी छोड़ी संगत के कहने से ही। संगत के रूप में आप फिर कहने लग गये हो। विचार करते-करते शाम हो गयी। संगत के कहने पर जाफरनामा लिखने का मन यहीं से बना। इस ढाब पर रहने के लिए कोई जगह न होने से गुरू जी गाँव चक्र जा विराजे। अगले दिन गाँव तखतूपुरा, गाँव मधे होते हुये, गाँव दीना साहिब में लखमीर और शमीर के पास रहने का मन बना लिया। यहीं से जाफरनामा लिखकर भाई दया सिंघ, भाई धरम सिंघ के द्वारा औरँगाबाद, औरँगजेब के पास भेज दिया। इस स्थान पर गुरू जी की मेहर है, जो भी आस लेकर आता है अरदास करता है, कभी खाली नहीं जाती।

1755. गुरूद्वारा श्री नानकसर साहिब जी ग्राम तखतुपुरा, जिला मोगा, किन किन गुरू साहिबानों से संबंधित है ?

3 गुरूओं से:
गुरू नानक देव जी
गुरू हरगोबिन्द साहिब जी
गुरू गोबिन्द सिंघ जी

1756. गुरूद्वारा श्री नानकसर साहिब जी ग्राम तखतुपुरा, जिला मोगा का श्री गुरू नानक देव जी से क्या इतिहासिक संबंध है ?

यह वो पवित्र स्थान है, जिस स्थान पर पहले श्री गुरू नानक देव जी ने अपने पवित्र चरण डाले। श्री गुरू नानक देव जी ने अपनी दूसरी उदासी संमत् बिक्रमी 1567 (सन् 1510) में आरम्भ की। गुरू जी मुलतानपुर से चलकर धमरकोट, तखतूपुरा, मत्ते की सरां, भटिंडा, सरसा, बीकानेर, अजमेर और राजपुताने में से होते हुऐ सँगलादीप तक गये। तखतूपुरे के स्थान पर, जहाँ गुरू जी रूके, वहाँ एक बहुत सँघणी झिड़ी थी। इस झिड़ी मे एक भरखरी और गोपीचँद नाम के दो जोगी रहते थे, जो की मामा-भान्जा थे। समय-समय बहुत से साधू इस झिड़ी में तपस्या करते रहे थे। गुरू जी जोगियों के साथ सुमेर पर्वत पर गये तो वहाँ भरखरी को बताया गया कि तेरा सँजोग जूनागढ़ की राजकुमारी के साथ है। लेकिन उस तक पहुँचने के लिए तेरे पास केवल आठ पहर का समय है, अगर ना पहुँचा तो वो मर जायेगी और तुझे उसके साथ विवाह करने के लिए दूसरा जन्म लेना होगा। भरखरी ने सिद्धों से विनती की, कि उसे वहाँ पहुँचाया जाये, बड़े-बड़े सिद्ध जबाब दे गये, कि इतने कम समय में नहीं पहुँचाया जा सकता। भरखरी के विनती करने पर गुरू जी ने उसे एक पहर में जूनागढ़ पहुँचा दिया और इसको यहीं बसने की शिक्षा दी और नाम दान, सिक्खी का उपदेश देकर कृतार्थ किया। यहाँ पर गुरू जी का एक सिक्ख जक्को हुआ, जिसने भरखरी को कड़वे बोल, बोल दिये, भरखरी गुस्से में आ गया। गुरू जी ने अपने पँजे को आगे करके जक्को जी को उसके क्रोध से बचाया, फिर भी भरखरी की कटली नजरों ने जक्को के जिगरे पर दाग कर दिये। गुरू जी के कहने पर जब, जक्को जी ने यहाँ बने हुए तालाब में स्नान किया, तो दाग दूर हो गये। यह ताल नानकसर हुआ। भरखरी, गुरू जी का आदेश पाकर यहाँ सिक्खी का प्रचार करने लगा। यहाँ सुन्दर गुरूद्वारा साहिब जी बना हुआ है। भरखरी का स्थान भी मौजुद है।

1757. गुरूद्वारा श्री नानकसर साहिब जी ग्राम तखतुपुरा, जिला मोगा का श्री गुरू हरगोबिन्द साहिब जी से क्या इतिहासिक संबंध है ?

श्री गुरू हरगोबिन्द साहिब जी इस स्थान पर भाई जाक्को जी को दर्शन देने के लिए आये थे, जो कि एक किसान था और गुरू जी का परम भक्त और श्रद्धालु था। गुरू जी इस स्थान पर 45 दिन तक रहे।

1758. गुरूद्वारा श्री नानकसर साहिब जी ग्राम तखतुपुरा, जिला मोगा का श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी से क्या इतिहासिक संबंध है ?

श्री गुरू गोबिन्द सिंघ जी दीना के रास्ते इस स्थान पर, दिसम्बर सन् 1705 में पधारे थे।

1759. गुरूद्वारा श्री अम्ब साहिब किस स्थान पर है ?

जिला मोहाली

1760. गुरूद्वारा श्री अम्ब साहिब का इतिहास क्या है ?

इस स्थान पर सातवें गुरू हरिराये साहिब जी ने चरण डालकर इस धरती को भाग लगाये और अपने गुरसिक्ख की मनोकामना पूरी की। भाई कूरम जी, जो गाँव लम्बिया के निवासी थे वो पाँचवें गुरू अरजन देव जी के दर्शन के लिए श्री अमृतसर साहिब पहुँचे। आमों का मौसम था। गुरू जी का दरबार सजा हुआ था। संगतें भेटां आदि पेश कर रही थीं। काबूल की संगत ने आम भेंट किये। भाई कूरम जी को यह महसूस हुआ कि मैं आमों के देश से आया हुँ, पर आम की सेवा न कर सका। रात को दरबार की समाप्ति हुयी आम का प्रशाद बँटा। संगतें अपने-अपने डेरों पर विश्राम करने चली गयी। भाई कूरम जी को जो, आम प्रशाद रूप में मिला था, वो उन्होंने सम्भाल कर रख लिया। सुबह दरबार में गुरू जी को भेंट कर दिया। गुरू जी तो अर्न्तयामी थे। गुरू जी ने भाई कूरम जी को बुलाकर कहा कि ये तो वो ही आम है, जो हमने आपको प्रशाद में दिया था, वो आपने हमें ही भेंट कर दिया। भाई कूरम जी बोले कि यह सच है कि ये आम मुझे पशाद में मिला था, क्योंकि मैं आमों के देश से आया हूँ और काबूल की संगत को देखकर, ये आम खाने से अच्छा आपको अर्पण करना उचित समझा। गुरू जी बोले कि तेरी ये भावना हमारे तक पहुँच गई है, अब तुम ये आम खा लो और जब हम सातवें जामें में आएँगे तो तेरी तरफ से आम खाएँगे। इसी वचन को निभाने के लिए गुरू हरिराये जी कुरूक्षेत्र से पोह की संगरांद को यहाँ पहुँचे और अपने सेवक के बारे में पूछा तो पता लगा कि वो अपने बाग में भक्ति में लीन है। गुरू जी ने बाग में आकर दर्शन दिये और कूरम से बोले भाई आम खिला। कूरम जी बोले गुरू जी ये आम का मौसम नहीं है, लेकिन आप करन-कारन समर्थ हो, जो चाहे कर सकते हो। सेवक की विनती सुनकर गुरू जी मुस्कुराए और कहा कि आम का पेड़ तो आमों से लदा हुआ है। भाई कूरम जी ने देखा कि जिस पेड़ के नीचे गुरू जी खड़े थे, उस पर पक्के आम लटक रहे हैं। भाई कूरम जी घरती पर गिर गए और घन्य-घन्य कहने लगे। गुरू जी ने कहा कि हमें और संगतों को आम खिलाओ। भाई कूरम जी ने गुरू जी और संगतों को आम खिलाए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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