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33. स्वाँगी संत

एक दिन भक्त नामदेव जी द्वारिका की एक नदी पर स्नान करने गए। वस्त्र उतारकर स्नान करने लग गए। वहीं पास ही एक लम्बे और भगवे चोले वाला संत रूप आदमी मृगशाला बिछाकर समाधी लगाकर बैठा हुआ था। उस नदी के किनारे पर एक सेठ पार जाने के लिए आया और बड़ी बेसब्री में बैठ गया। जब बेड़ी अर्थात नाव आई तो सेठ उस पर चड़कर पार निकल गया। उस सेठ को पार जाकर पता लगा कि उसकी रूपयों वाली थैली इस पार रह गई है। वह चिँतातुर होकर वापिस आया तो थैली कहीं नजर नहीं आई। उनके विचार किया कि साधू महात्मा तो भजन में मग्न है, मेरी थैली जरूर इस स्नान करने वाले (भक्त नामदेव जी) ने छुपा ली होगी। इसलिए उसने भक्त नामदेव जी से पूछताछ की। सेठ बोला: महाश्य जी ! क्या मेरी थैली आप ने ली है ? भक्त नामदेव जी ने कहा: भले आदमी ! हमें तुम्हारी थैली के बारे में कुछ पता नहीं है। सेठ ने कहा: महाश्य जी ! आप दो ही आदमी नदी के इस पार थे। संत महाराज जी तो अपने भजन में मस्त हैं। इसलिए मेरी थैली आपने ही ली है। वह आपके ही पास हो सकती है, इसलिए कृपा करके वह वापिस कर दो, नहीं तो मैं तुम्हें दरबार में लेकर जाऊँगा। इतने में वह स्वाँगी संत बोला: सेठ जी ! आपकी थैली इसी आदमी ने उठाई है। इसको दरबार में ले चलो। इतना सुनते ही सेठ ने भक्त नामदेव जी को बहुत बुरा-भला कहा और उन्हें धक्के भी मारे। भक्त नामदेव जी ने शान्ति से कहा: भले इन्सान ! अगर तेरा माल हमारे पास है तो बेशक हमें दरबार में ले चल और दण्ड दिला दे। इतनी देर में ही परमात्मा की कुदरत से जोर की हवा चलने लगी, जिससे उस स्वाँगी साधु का आसन उड़ गया और रूपयों की थैली जो कि आसन के नीचे उस स्वाँगी साधू ने छिपाकर रखी हुई थी, वह सामने आ गई। भक्त नामदेव जी ने कहा: भले इन्सान ! वह रही तेरी थैली, लो उठा लो। सेठ ने दौड़कर अपनी रूपयों की थैली उठा ली। सेठ नामदेव जी से बोला: भाई जी ! मुझे क्षमा करना, मैं अनजाने में आपसे अवज्ञा कर बैठा। भक्त नामदेव जी बोले: सेठ जी ! हम कौन होते हैं किसी को माफ करने वाले। क्षमा करने वाला जो सबसे बड़ा अर्थात परमात्मा है, वह करता है। सेठ जी ने उस स्वाँगी साधू के गले में साफा डाला और उसे घसीटता हुआ राज दरबार ले जाने लगा। इस स्वाँगी साधू का पाखण्ड देखकर भक्त नामदेव जी ने बाणी उच्चारण की जो कि श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी में “राग आसा“ में दर्ज है:

सापु कुंच छोडै बिखु नही छाडै ॥
उदक माहि जैसे बगु धिआनु माडै ॥१॥
काहे कउ कीजै धिआनु जपंना ॥
जब ते सुधु नाही मनु अपना ॥१॥ रहाउ ॥
सिंघच भोजनु जो नरु जानै ॥
ऐसे ही ठगदेउ बखानै ॥२॥
नामे के सुआमी लाहि ले झगरा ॥
राम रसाइन पीओ रे दगरा ॥३॥४॥ अंग 485

अर्थ: साँप केंचूली तो छोड़ देता है, परन्तु जहर नहीं छोड़ता अर्थात इस पाखण्डी संत ने कपड़े तो जरूर बदल लिए हैं, परन्तु विषय रूप जहर अर्थात बुरे स्वभाव नहीं छोड़े। इसकी समाधी ऐसी है, जिस तरह पानी में बगला ध्यान जोड़ता है, परन्तु मन शुद्ध नहीं होता है। सिंघरों जैसे अर्थात तितर का जोड़ा। एक जानवर जँगल में होता है वो आप तो कहता है कि काहली ना कर यानि जल्दबाजी न कर, पर आप ही जब शेर उबासी लेता है तो उसकी दाड़ों में से माँस निकाल लेता है। अर्थात जो आदमी शेर जैसे जीव को मारकर खाना जानता है वह उसी प्रकार से ठगों का गुरू कहा जाता है। नामदेव जी कहते हैं कि मेरे स्वामी ने मेरे गले से झगड़ा निकाल दिया है। परमात्मा इस स्वाँगी साधू के गले से पाखण्ड का झगड़ा उतार दे। नामदेव जी उस साधू को सम्बोधन करके कहते हैं कि यह स्वाँगी के भेष वाले झगड़े अपने गले से उतार दे और परमात्मा का रूप अमृत पी यानि उसका नाम जप। यह उस परमात्मा से मिलने का सबसे अच्छा, सीधा रास्ता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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