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26. नामदेव जी और बादशाह

अब कपटी ब्राहम्णों के सारे कपट निष्फल हो चुके थे। यह ठीक है कि इतनी भारी असफलता के कारण कई आदमी ब्राहम्णों की मण्डली का साथ छोड़ गए थे। किन्तु अभी भी कुछ नास्तिक थे जो कि भक्त नामदेव जी के साथ वैर-विरोध रखते थे और वह किसी मौके की तलाश में रहने लगे। उन्होंने योजना बनाई कि हाकिम के पास भक्त नामदेव जी की झूठी-मूठी रिर्पोट लिखाकर उन्हें पकड़वा देते हैं और वहीं पर उनका खात्मा कर देंगे। इस नीच योजना को पूरा करने के लिए उन्होंने उस समय के बादशाह मुहम्मद तुगलक के पास दौलताबाद में सन 1338 में जाकर चुगली की कि हमारे इलाके में भक्त नामदेव ऐसा आदमी है जो बड़ी-बड़ी करामातें दिखाता है, वह अमीरों को कँगाल और कँगालों को अमीर बना देता है और तो और मूर्दों को भी जीवित कर देता है। इस प्रकार से इन नीचों ने खूब उल्टी-सीधी बातें नमक-मिर्च लगाकर बादशाह को बताईं और भक्त नामदेव जी की गिरफ्तारी का हुक्म जारी करवा दिया। भक्त नामदेव जी अपने घर पर परमात्मा के नाम सिमरन के रँग में मस्त थे कि तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। जब भक्त नामदेव जी ने दरवाजा खोला तो सामने 2-3 सरकारी आदमी खड़े थे। उन्होंने पूछा: महाश्य जी ! क्या आप ही भक्त नामदेव जी हैं ? भक्त नामदेव जी ने कहा: भले लोगों ! हाँ, इसी शरीर को नामदेव कहते हैं। वह आदमी बोले: भक्त जी ! बादशाह सलामत ने आपको बुलाया है। भक्त जी की माता चिंता करती हुई बोली: बेटा ! बादशाह ने इन्हें क्यों बुलाया है ? शाही आदमी बोले: माता जी ! ये तो बादशाह ही जानें, हम तो उनके हुक्म के गुलाम हैं, जैसा हुक्म करते हैं हम वैसी पालना करते हैं। भक्त नामदेव जी: भले लोगों ! अगर बादशाह ने हमें बुलाया है तो हम आपके साथ जरूर जाएँगे। इतना कहकर भक्त नामदेव जी उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गए। यह बात पूरे नगर में जँगल की आग की तरह फैल गई कि भक्त नामदेव जी गिरफ्तार हो गए हैं। कई लोग तो रोने लगे। आखिर भक्त नामदेव जी तैयार होकर बादशाह के आदमियों के साथ चल पड़े। उनके साथ जाने के लिए बहुत से आदमी तैयार थे, परन्तु भक्त नामदेव जी ने सबको रोक दिया। परन्तु दो-चार निकटवर्तियों को साथ में ले जाने पर राजी हो गए और बादशाह के पास पहुँच गए। बादशाह ने अपने अहँकार में कहा: भक्त नामदेव ! मेरी गाय मर गई है उसको जीवित कर दो। भक्त नामदेव चाहे पूरी शक्ति के मालिक थे फिर भी वह बोले: बादशाह ! जो मर गया सो मर गया उसे कोई जीवित नहीं कर सकता। बादशाह जानता था कि भक्त नामदेव जी मरी हुई गाय को जीवित कर सकते हैं, परन्तु वह इन्कार कर रहे हैं। यानि बादशाह के सामने इन्कार। यह तो हमारा सरासर अपमान है, इसकी इतनी जुर्रत। उसने भक्त नामदेव जी को भयभीत करने की योजना बनाई। बादशाह बड़े ही क्रोध में बोला: सैनिकों ! इसके हाथ बाँधकर खूनी हाथी के सामने डाल दो। बादशाह का ख्याल था कि शायद मौत को सिर पर मँडराती देखकर भक्त नामदेव मेरा हुक्म मान लेगा। साथ ही यह भी कहा कि अगर वह इस्लाम स्वीकार कर लें तो उन्हें यह सजा नहीं दी जाएगी। बादशाह ने भक्त नामदेव जी को बड़े-बड़े कष्ट दिए। पहले तो बहुत समय तक हथकड़ी लगाकर बन्दीगृह में रखा। फिर हाथ बाँधकर खूनी हाथी के आगे फैंका। इसके बाद गहरे पानी में फैंका। मतलब जो-जो भी हो सकता था वो सब करके बार-बार भक्त नामदेव जी को मुस्लमान बनने के लिए मजबूर किया गया पर भक्त नामदेव जी के दृढ़ इरादे को नहीं तोड़े सका। अपने धर्म के लिए इतने जूल्म सहने वाले उस सयम में वह पहली मिसाल थी, क्योंकि धर्म के लिए जूल्म सहने वाला वाक्या कभी भी नहीं हुआ था। इससे यह हुआ कि लोगों में जागरूकता पैदा हो गई। भक्त नामदेव जी ने उस परमात्मा की शक्ति द्वारा इन कष्टों को हँसते-हँसते झेल लिया और परमात्मा की उसतति के लिए बाणी गायन की जो कि “राग मारू“ में श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी में दर्ज है:

चारि मुकति चारै सिधि मिलि कै दूलह प्रभ की सरनि परिओ ॥
मुकति भइओ चउहूं जुग जानिओ जसु कीरति माथै छत्रु धरिओ ॥१॥
राजा राम जपत को को न तरिओ ॥
गुर उपदेसि साध की संगति भगतु भगतु ता को नामु परिओ ॥१॥रहाउ॥
संख चक्र माला तिलकु बिराजित देखि प्रतापु जमु डरिओ ॥
निरभउ भए राम बल गरजित जनम मरन संताप हिरिओ ॥२॥
अम्मबरीक कउ दीओ अभै पदु राजु भभीखन अधिक करिओ ॥
नउ निधि ठाकुरि दई सुदामै ध्रूअ अटलु अजहू न टरिओ ॥३॥
भगत हेति मारिओ हरनाखसु नरसिंघ रूप होइ देह धरिओ ॥
नामा कहै भगति बसि केसव अजहूं बलि के दुआर खरो ॥४॥१॥ अंग 1105

अर्थ: "(चारों शक्तियाँ, चारों सिद्धियाँ मिलकर उसके दर पर पुकारती हैं। जो उस परमात्मा की शरण में आया है वो चारों युगों में मुक्त हुआ समझा जाता है और शोभा का छत्र उसके सिर पर झूलता है। सरब व्यापी परमात्मा का नाम जप-जपकर कौन-कौन मुक्त नहीं हुआ अर्थात सभी लोग मुक्त हो गए हैं। गुरू के उपदेश और साध संगत द्वारा जिसने नाम जपा है। वह भक्त प्रसिद्ध हो गया है। ऐसे भक्तों के माथे पर यश रूपी तिलक लगा हुआ होता है। उसको देखकर यमदूत भी भाग जाते हैं। वह परमात्मा की शक्ति के कारण निरभय हो जाते हैं और जन्म-मरण का कलेश उनसे दूर रहता है। परमात्मा के सिमरन ने अंबरीक को निरभय कर दिया और विभीषण को चिरकाल तक राज कराया, सुदामा को उसने निधियाँ बक्श दी और ध्रुव को अटल पदवी दे दी। भक्त प्रहलाद की खातिर हरनाखस को मारा और नरसिंघ रूप धारण किया यानि अपनी शक्ति को नरसिंह रूप बनाकर भेजा। नामदेव जी कहते हैं कि वह परमात्मा भक्तों के बस है और उसकी सहायता करता है।)" बादशाह, भक्त नामदेव जी की आत्मिक शक्ति, दृढ़ता और शान्त स्वभाव और तेज देखकर उनके चरणों में गिर पड़ा और अपने अपराध की क्षमा माँगने लगा। भक्त नामदेव जी ने उसे अपनी दया दृष्टि से क्षमा कर दिया। बादशाह ने भक्त नामदेव जी की बड़ी इज्जत की और बहुत सारा धन और वस्त्र आदि भेंट किए, जिसे भक्त नामदेव जी ने लेने से इन्कार कर दिया और कहा कि यह हमारे किसी काम की नहीं। बादशाह ने फिर विनती की कि कुछ तो स्वीकार करो। तो भक्त नामदेव जी ने कुछ चीजें स्वीकार कर ली और गरीबों में बाँट दी। बादशाह ने भक्त जी के लिए बड़े प्यार और आदर के साथ एक दोशाला पेश किया जो कि भक्त नामदेव जी ने स्वीकार कर लिया। बादशाह ने अपने आदमी साथ देकर भक्त नामदेव जी को विदा किया।

राग भैरउ
सुलतानु पूछै सुनु बे नामा ॥ देखउ राम तुम्हारे कामा ॥१॥
नामा सुलताने बाधिला ॥ देखउ तेरा हरि बीठुला ॥१॥ रहाउ ॥
बिसमिलि गऊ देहु जीवाइ ॥ नातरु गरदनि मारउ ठांइ ॥२॥
बादिसाह ऐसी किउ होइ ॥ बिसमिलि कीआ न जीवै कोइ ॥३॥
मेरा कीआ कछू न होइ ॥ करि है रामु होइ है सोइ ॥४॥
बादिसाहु चड़्हिओ अहंकारि ॥ गज हसती दीनो चमकारि ॥५॥
रुदनु करै नामे की माइ ॥ छोडि रामु की न भजहि खुदाइ ॥६॥
न हउ तेरा पूंगड़ा न तू मेरी माइ ॥ पिंडु पड़ै तउ हरि गुन गाइ ॥७॥
करै गजिंदु सुंड की चोट ॥ नामा उबरै हरि की ओट ॥८॥
काजी मुलां करहि सलामु ॥ इनि हिंदू मेरा मलिआ मानु ॥९॥
बादिसाह बेनती सुनेहु ॥ नामे सर भरि सोना लेहु ॥१०॥
मालु लेउ तउ दोजकि परउ ॥ दीनु छोडि दुनीआ कउ भरउ ॥११॥
पावहु बेड़ी हाथहु ताल ॥ नामा गावै गुन गोपाल ॥१२॥
गंग जमुन जउ उलटी बहै ॥ तउ नामा हरि करता रहै ॥१३॥
सात घड़ी जब बीती सुणी ॥ अजहु न आइओ त्रिभवण धणी ॥१४॥
पाखंतण बाज बजाइला ॥ गरुड़ चड़्हे गोबिंद आइला ॥१५॥
अपने भगत परि की प्रतिपाल ॥ गरुड़ चड़्हे आए गोपाल ॥१६॥
कहहि त धरणि इकोडी करउ ॥ कहहि त ले करि ऊपरि धरउ ॥१७॥
कहहि त मुई गऊ देउ जीआइ ॥ सभु कोई देखै पतीआइ ॥१८॥
नामा प्रणवै सेल मसेल ॥ गऊ दुहाई बछरा मेलि ॥१९॥
दूधहि दुहि जब मटुकी भरी ॥ ले बादिसाह के आगे धरी ॥२०॥
बादिसाहु महल महि जाइ ॥ अउघट की घट लागी आइ ॥२१॥
काजी मुलां बिनती फुरमाइ ॥ बखसी हिंदू मै तेरी गाइ ॥२२॥
नामा कहै सुनहु बादिसाह ॥ इहु किछु पतीआ मुझै दिखाइ ॥२३॥
इस पतीआ का इहै परवानु ॥ साचि सीलि चालहु सुलितान ॥२४॥
नामदेउ सभ रहिआ समाइ ॥ मिलि हिंदू सभ नामे पहि जाहि ॥२५॥
जउ अब की बार न जीवै गाइ ॥ त नामदेव का पतीआ जाइ ॥२६॥
नामे की कीरति रही संसारि ॥ भगत जनां ले उधरिआ पारि ॥२७॥
सगल कलेस निंदक भइआ खेदु ॥ नामे नाराइन नाही भेदु ॥२८॥१॥१०॥
अंग 1165, 1166

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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