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25. जहर देने का नीच यत्न

ब्राहम्णों की नीच मण्डली को जब भक्त नामदेव जी को नदी में डुबाकर मारने में सफलता नहीं मिली तो वो ओर कोई योजना सोचने लगे। अन्त में यह योजना बनाई गई कि किसी खाने वाली चीज में भक्त नामदेव जी को जहर मिलाकर खिला दिया जाए और हमेशा के लिए अपने शत्रु को खत्म कर दिया जाए। उक्त सँकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने जहर से भरे हुए लडडु तैयार करवाए और उन्हें एक थाल में सजाकर एक सुन्दर कपड़े से ढका गया और बड़ी भोली-भाली और श्रद्धालू की शक्ल बनाकर भक्त नामदेव जी के आगे जाकर रख दिए और विनती करने लगे कि महाराज यह प्रसाद स्वीकार करो। भक्त नामदेव जी ने पहले उन्हें प्रसाद दिया और फिर अपने परिवार के सदस्यों में बाँट दिया। परिवार के सदस्यों ने तो उसी समय प्रसाद खा लिया जबकि ब्राहम्णों ने उसे बाहर आकर फैंक दिया। वह नीच इस बात से खुश थे कि भक्त नामदेव जी परिवार समेत मर जाएँगे। पर वो महामूर्ख यह नहीं जानते थे :

जाको राखै हरि राखनहार ।। ताको कोई न साकै मार ।।

वो परमात्मा तो अपने भक्तों की आप ही रक्षा करता है। वैसे भी भक्त नामदेव जी और उनके परिवार को तो परमात्मा के नाम के नशे की खुमारी थी, वो तो हर समय राम नाम ही जपते रहते थे, उन पर भला दुनियावी नशे क्या असर करते। इसलिए भक्त नामदेव जी और उनके परिवार का बाल भी बाँका नहीं हुआ अर्थात उन पर तो जहर का असर ही नहीं हुआ। हरि के भक्तों को तो पहाड़ों से फैंका गया, आग में डाला गया, गर्म खम्बों से लगाया गया, तो भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा तो फिर इस जहर की क्या औकात जो कि हरि के भक्तों का कुछ बिगाड़ पाता। ब्राहम्णों की नीच मण्डली जब घर जाकर सो गई तो वह सो नहीं सके, क्योंकि यमदूतों ने उन्हें सोने ही नहीं दिया। वह जैसे ही नींद में आते, उनके सपनों में यमदूत उनके पापों की सजा देने के लिए आ जाता। वो सब पूरी रात नहीं सो सके और इनमें से एक आदमी तो डर के मारे मर ही गया। उसके घर में रोने-पिटने की आवाजें आने लगीं। उसकी पत्नी इतनी जोर-जोर से रो रही थी कि वह बार-बार गश खाकर बेहोश हो जाती थी। लोगों ने कहा कि तुमने एक भक्त को बार-बार परेशान किया है और उसे सताया है, यह उसी की सजा है। अब मरने वाले के परिवार में पश्चात्ताप करने की सूझी और वह भक्त नामदेव जी के घर पर आकर उनके चरणों में आ गिरे और क्षमा की भीख माँगने लगे। भक्त नामदेव जी ने कहा: ओ भले लोगों ! क्षमा तो उस परमात्मा से माँगों जो सभी का जीवनदाता है। सभी बोले: महाराज जी ! हम तो पापी हैं, वो कब हमारी सुनता है। आप कुछ दया करो तो हमारी बेड़ी भी किनारे पर लग जाए। यह सुनकर भक्त जी को उन पर बड़ी दया आई और उन्होंने परमात्मा से अरदास की, जो कि परमात्मा ने स्वीकार कर ली और मरे हुए ब्राहम्ण को जीवनदान मिल गया और वह राम राम करता हुआ उठ बैठा। सारे परिवार में खुशी का लहर दौड़ गई और सारे बड़े ही हैरान हुए और वह सारे लोग भक्त नामदेव जी के चरणों में गिर पड़े और उपदेश लेकर घर को गए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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