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5. परमात्मा द्वारा दूध ग्रहण करना

एक दिन भक्त नामदेव जी के पिता जी दामशेट ने अपने पुत्र नामदेव जी से कहा– बेटा ! कल मुझे बाहर जाना है इसलिए सुबह ठाकुर जी की पूजा तुझे ही करनी होगी। पिता जी से यह बात सुनकर भक्त नामदेव जी अत्यँत प्रसन्न हुए, उनके मन में जिस ईश्वरीय जोत के दर्शनों के लिए सँकल्प उठ रहे थे वह घड़ी बहुत नजदीक आ गई। वह इन्तजार की घड़ी में लीन होकर बाणी उच्चारण करने लगे, जो कि "राग गोंड" में है:

मोहि लागती तालाबेली ॥ बछरे बिनु गाइ अकेली ॥१॥
पानीआ बिनु मीनु तलफै ॥ ऐसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥१॥ रहाउ ॥
जैसे गाइ का बाछा छूटला ॥ थन चोखता माखनु घूटला ॥२॥
नामदेउ नाराइनु पाइआ ॥ गुरु भेटत अलखु लखाइआ ॥३॥
जैसे बिखै हेत पर नारी ॥ ऐसे नामे प्रीति मुरारी ॥४॥
जैसे तापते निर्मल घामा ॥ तैसे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥५॥४॥  अंग 874

सचमुच जिस प्रकार से पानी के लिए मछली, बादलों के लिए मोर और चाँद के लिए चकोर तड़पता है इसी प्रकार से भक्त नामदेव जी परमात्मा के दर्शनों के लिए तड़पते हैं और पल-पल व्यतीत कर रहे हैं। इस प्रकार रात बीती और अमृत समय यानि ब्रहम समय हुआ। भक्त नामदेव जी उठे स्नान किया और बड़े ही साफ बर्तन में कपल गाय का दूध दोहा और बड़े प्रेम के साथ सोने की कटोरी में डाला और मुख से हरि जाप करते हुए बड़ी श्रद्धा और प्रेम से मन्दिर पहुँचे। अगर वह उस पत्थर की मूर्ति को ही परमात्मा समझते होते तो अपने पिता जी की तरह दूध रखकर घण्टी बजाकर वापिस आ जाते, परन्तु वो तो परमात्मा उसे मानते थे जो सभी के अन्दर कण-कण में व्याप्त है। इसलिए उन्होंने दूध की भेंट आगे रखकर परमात्मा के चरणों में लिव लगा दी और बाणी उच्चारण की:

मै अंधुले की टेक तेरा नामु खुंदकारा ॥
मै गरीब मै मसकीन तेरा नामु है अधारा ॥१॥ रहाउ ॥
करीमां रहीमां अलाह तू गनीं॥
हाजरा हजूरि दरि पेसि तूं मनीं ॥१॥
दरीआउ तू दिहंद तू बिसीआर तू धनी ॥
देहि लेहि एकु तूं दिगर को नही ॥२॥
तूं दानां तूं बीनां मै बीचारु किआ करी ॥
नामे चे सुआमी बखसंद तूं हरी ॥३॥१॥२॥ अंग 727

अर्थ: हे प्रभू ! मैं अति गरीब और मसकीन हूँ, एक तेरे नाम का ही आधार है। तूँ मेहर करने वाला है, तूँ हर स्थान पर हाजिर नाजिर है, तूँ दाता है और दरिया दिल है, तूँ मेरे लिए एक ही है और कोई नहीं। तूँ समझदार है और सब कुछ जानता है। मैं इसमें कोई विचार नहीं कर सकता। तूँ ही मेरा मालिक और मेहर करने वाला है। विनती करने के पश्चात जब उन्होंने आँखें खोली तो दूध की कटोरी पूरी भरी हुई थी यह देखकर कि परमात्मा ने दूध का भोग नहीं लगाया वह बहुत दुखी हुए और उनके दिल में ख्याल आया कि मैं अनजान बच्चा हूँ, शायद मुझसे कोई भूल हो गई है, अवज्ञा हो गई है, इस कारण से मेरी भेंट स्वीकार नहीं हुई। उन्होंने अत्यँत अधीर होकर परमात्मा से विनती की– हे दयालू पिता ! मैं अनजान बच्चा तेरे दर पर भेंटा लेकर हाजिर हुआ हूँ। मैंने अनेक भूलें की होगीं, पर तेरा नाम बखसिंद है इसलिए मुझे बक्श दो। जब मेरे पिता जी की भेंट रोज स्वीकार करता है तो क्या आज मेरी भेंट स्वीकार नहीं करोगे ? मेरे पिता जी मुझे गुस्सा होंगे। अपनी शरण में आए हुए बच्चे का दिल ना तोड़ो। जब भक्त नामदेव जी ने फिर देखा तो दूध की कटोरी में दूध वैसा का वैसा ही था। यह देखकर भक्त नामदेव जी गिड़गिड़ाकर जोश में बोलने लगे– हे दीनानाथ ! मैंने तो सुना था कि आप शरण में आए हुओं की बहुत जल्दी पूकार सुनते हो, मैं दो बार विनती कर चुका हूँ पर आपने मौन धारण किया हुआ है। क्या मैं इतना अपराधी हूँ कि मेरी भेंट स्वीकार नहीं की जाएगी ? क्या में इतना बुरा हूँ आपने मेरी की गई विनती का कोई उत्तर ही नहीं दिया। यदि ऐसी बात है तो फिर मेरे जीवन की क्या जरूरत है, मैं अपना जीवन ही समाप्त कर लूँगा। भक्त नामदेव जी इस प्रकार से दुखी होकर अपने मन में विनती करने लगे कि तभी अचानक उनके एकदम महान प्रकाश को दर्शन हुए जिसमें सरब व्यापी निराकर परमात्मा को साकार रूप में प्रत्यक्ष देखा। वो भक्त नामदेव जी की अनन्य भक्ति और दृढ़ विश्वास पर प्रसन्न होकर हँस रहे थे और अपनी पवित्र रसना से फरमा रहे थे– एक भक्त का ही मेरे दिल में वास होता है। इसके साथ ही उन्होंने भक्त नामदेव जी द्वारा लाया हुआ दूध ग्रहण किया। भक्त नामदेव जी इस समय इस आनंद अवस्था में मग्न उस महान जोत के साथ एकमिक हो रहे थे और अपनी भेट स्वीकार होती देखकर गदगद हो रहे थे। भक्त नामदेव जी परमात्मा को दूध पिलाकर और प्रसन्न चित होकर अपने घर पर वापिस आए। श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी में इस प्रसँग की बाणी भक्त नामदेव जी की दर्ज है:

दूधु कटोरै गडवै पानी ॥ कपल गाइ नामै दुहि आनी ॥१॥
दूधु पीउ गोबिंदे राइ ॥ दूधु पीउ मेरो मनु पतीआइ ॥
नाही त घर को बापु रिसाइ ॥१॥ रहाउ ॥ सुइन कटोरी अमृत भरी ॥
लै नामै हरि आगै धरी ॥२॥ एकु भगतु मेरे हिरदे बसै ॥
नामे देखि नराइनु हसै ॥३॥ दूधु पीआइ भगतु घरि गइआ ॥
नामे हरि का दरसनु भइआ ॥४॥३॥  अंग 1163

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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