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54. हिन्दू और मुस्लमानों में टक्कर

कबीर जी की अन्तिम यात्रा की चर्चा क्योंकि उनके शिष्यों और आम लोगों में दूर-दूर तक पहुँच गई थी, इसलिए भारी गिनती में लोग आए हुए थे, जिसमें हिन्दू भी थे और मुस्लमान भी थे। इसमें मुस्लमानों का लीडर नवाब बिजली खान पठान था और हिन्दूओं का लीडर काशी का राजा बरदेव सिँह। जब दोपहर हो गई और दरवाजा खोलने का समय आया, जैसा कि कबीर जी जोती जोत समाने से पहले बता गए थे कि दोपहर को ही दरवाजा खोला जाए। नवाब बिजली खान पठान ने कहा: कि सभी हिन्दू एक तरफ हो जाए। कबीर जी मुस्लमान थे इसलिए हम उनकी पवित्र देह को इस्लामी विधि अनुसार कब्र में दफनाने का प्रबंध करते हैं। नबाव बिजली खान की यह बात सुनकर काशी के राजा बरदेव सिंघ को क्रोध आ गया। राजा बरदेव सिंघ ने कहा: कि यह कौन कहता है कि कबीर जी मुस्लमान थे। वह रामानँद जी के चेले थे। जन्म से मुस्लमान हुए तो क्या हुआ। जीवन तो उन्होंने हिन्दू बनकर गुजारा है, इसलिए हम हिन्दू रीति के अनुसार उनका अन्तिम सँस्कार करेंगे। नवाब बिजली ने ललकारते हुए कहा: यह नहीं हो सकता। काशी के राजा ने भी ललकारते हुए कहा: यही होगा। नवाब बिजली खान ने कहा: तब तो फैसला तलवार ही करेगी। काशी के राजा ने कहा: हमने कोई चूड़ियाँ नहीं पहनी हुईं। इस प्रकार से दोनों पक्षों की तलवारें म्यानों में से बाहर आ गईं और वह उनके पवित्र शरीर के लिए हिन्दू और मुस्लमान जँग करने के लिए तैयार हो गए जो जीवन भर दोनों मजहबों को भाईयों जैसे रहने के लिए प्रेरणा देते रहे थे। जब दोनों पक्षों की तलवारें एक-दूसरे का खुन पीने के लिए तत्पर थीं, तभी कमरे में से कबीर जी की आवाज आई:

हिन्दू कहे हम ले जारों, तुरक कहें हमारे पीर ।।
आपस में दोनों मिल झगड़े डाढो देखहि हंस कबीर ।।

सभी हैरानी के साथ उस कमरे की तरफ देख रहे थे। तभी कबीर जी की आवाज फिर से सुनाई दी:

तुम खोलो परदा है नहीं मुरदा जुध सिखिआ तुम कर डारो ।।

इसके द्वारा साफ-साफ बताया जा रहा था कि ऐसे ही लड़ाई कर रहे हो, दरवाजा खोलकर तो देख लो, यहाँ पर तो कोई मुर्दा है ही नहीं। यह सुनकर सभी ने अपनी अपनी तलवारें धरती पर पटक दीं। नवाब बिजली खान पठान और काशी के राज बरदेव सिंह को जिसका नाम बीर सिंह भी था, इन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। यह फैसला किया गया कि दरवाजा खोलकर देखा जाए। दरवाजा खोलकर दोनों तरफ से पाँच-पाँच आदमी अन्दर गए और वह देखकर हैरान रह गए कि फर्श पर एक-दूसरे के ऊपर चादरें तो बिछी हुई हैं परन्तु उनके बीच में कुछ भी नहीं है। जब चादर उठाई गई तो वहाँ पर कमल के ताजा फूल थे, इन्हें देखकर ऐसा लगता था कि जैसे अभी-अभी बिछाए गए हों। यह देखकर दोनों पक्षों को ज्ञान हो गया कि सारी मनुष्य जाति को एक करने का ख्याल देने वाला महापुरूष कभी भी जँग का कारण नहीं बन सकता। दोनों पक्षों को अपनी गल्ती का अहसास हुआ और वह आपस में गले लगे। दोनों पक्षों ने आपस में सलाह करके दोनों चादरों में आधे-आधे फूल लेकर बाँध लिए। एक चादर हिन्दूओं ने और दूसरी मुस्लमानों ने ले ली। नवाब बिजली खान पठान ने उसी कमरे में कबीर जी की इस्लामी विधी से कब्र में वह चादर फूलों समेत दफना दी और उनकी समाधि बना दी। दूसरी तरफ काशी के राजा काशी में फूल और चादर लेकर वापिस आ गए और उनका मन्दिर तैयार किया जो कि अब "कबीर चौरा" के नाम से प्रसिद्ध है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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