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49. राम जी के भक्त और दौलत

बेशक धन दौलत के बिना गुजारा नहीं हो सकता। पेट खाना माँगता है और कपड़ा आदि और रहने की जरूरतें चाहिए। परन्तु कबीर जी ज्यादा धन और दौलत वालों का अहँकार बड़ी ही सहजता से तोड़ देते थे। धनी लोगों में उनका एक नया चेला नवाब बिजली खान पठान भी था। वह कबीर जी से मिलने आ रहा था और उनके लिए कीमती उपहार और पाँच सौ सोने की मोहरे भी ला रहा था। परन्तु काशी आते समय रास्ते में उनके मन में एक अहँकार ने जन्म लिया कि कबीर जी एक गरीब जुलाहे हैं और आज तक किसी ने भी इतनी बड़ी भेंट नहीं की होगी। यह सोचता हुआ वह काशी पहुँच गया और कबीर जी के स्थान पर आकर संगत में हाजिर हुआ और उनके चरणों को हाथ लगाकर वह समस्त उपहार और पाँच सौ सोने की मोहरें भी रख दी। बिजली खान ने कहा: महाराज जी ! यह पाँच सौ सोने की मोहरे हैं, इन्हें आप अन्दर रखवा दिजिए, जिससे यह सुरक्षित हो जाएँ। कबीर जी ने कहा कि: आपको अब इनकी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। यह अच्छे लेखे लग गई हैं। नवाब बिजली खान पठान बोला कुछ नहीं, परन्तु उसको कबीर जी की यह बेपरवाही खड़कती जरूर रही। सतसंग समाप्त हो गया तो भी कबीर जी ने मोहरों की थैली की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर उठकर खड़े हो गए और कहने लगे– भक्त ! चलो आपकों अपने एक गुरूभाई के दर्शन करवा लाएँ। वह कबीर जी के साथ चल पड़ा और कबीर जी उसे दरिया के किनारे भक्त रविदास चमार की झोपड़ी में ले गए। भक्त रविदास जी ने खड़े होकर कबीर जी का और बिजली खान का स्वागत किया और सत्कार के साथ अपने पास बिठा लिया।  इधर-उधर की बातें करने के बाद कबीर जी ने कहा: रविदास जी ! सुना है आपके यहाँ पर कल झालां की रानी आई थी ? रविदास जी ने याद करने की कोशिश की और फिर बोले: कबीर जी ! वह एक हीरा दे गई थी। यह सुनकर बिजली खान पर जैसे बिजली ही गिरी वह सोचने लगा: कि एक चमार की झोपड़ी में रानियाँ भी आती हैं और कीमती हीरे भेंट करती हैं। कबीर जी ने पूछा: रविदास जी ! वह हीरा कहाँ है ? रविदास जी ने कहा: कबीर जी ! देखो, शायद इस कोने में पड़ा होगा। मैंने तो कल ही उन्हें कह भेजा था कि पत्थर का यह टुकड़ा ले जाओ और इसको किसी लेखे लगा दो। कबीर जी उठकर झौपड़ी से उस कोने पर चले गए, जिस स्थान पर हीरा रखा हुआ था। कबीर जी हीरा उठाकर ले आए। कबीर जी ने बिजली खान से पूछा: क्यों भक्त जी ! यह कितने का होगा ? हीरे की चमक देखकर नवाब बिजली खान दँग रह गया। उसके दोनों हाथों में एक बेशकीमती हीरा था। बिजली खान हीरे बारे में कुछ जानते थे और उन्हें हीरे एकत्रित करने का शौक भी था। बिजली खान ने कहा कि: महाराज ! यह बहुत ही सुन्दर हीरा है, बहुत कीमती है। होगा कोई दस हजार सोने की मोहरों का। भक्त रविदास जी ने बिजली खान की बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। वह बेपरवाही से जूतियाँ सीते रहे। कबीर जी ने कहा कि: बहुत अच्छा ! इसे बेच आओ। संत जनों का भण्डारा हो जाएगा। रविदास जी ने इस सारी बातचीत में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और कबीर जी समेत नवाब बिजली खान पठान दोनों उठकर आ गए। बिजली खान को बहुत बड़ी भेंट चड़ाने का जो अहँकार हो गया था वह सारा उतर चुका था यह देखकर कि इन फकीरों को तो दस-दस हजार की मोहरों के हीरे भेंट होते हैं और फिर भी यह उनकी तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखते, मेरी पाँच सौ मोहरे तो कहीं भी नहीं हैं।

वापिस जब वह कबीर जी के निवास स्थान पर पहुँचे तो वह और भी ज्यादा हैरान हो गए कि वहाँ पर सैकड़ों गरीब मिठाई लेकर जा रहे हैं और बाहर दरवाजे पर खड़ा हुए संत कमाल जी जो कि कबीर जी के पुत्र हैं वह नवाब द्वारा लाई गई मोहरों की थैली में से सभी को एक-एक मोहर देता जा रहा है। उसके देखते ही देखते वह सारी मोहरें खत्म हो गई। थैली खाली हो गई। इतने में कबीर जी का एक और भक्त आ गया उसने बहुत सुन्दर पोशाक पहनी हुई थी। वह बड़ी नम्रता के साथ कबीर जी के चरणों में झुका और माथा टेककर बैठ गया। उसकी आँखों में से आँसु गिरते दिखाई दिए। कबीर जी ने बड़े प्रेम से पूछा कि: भक्त सवरन शाह ! आपकी उदासी का क्या कारण है ? सवरन शाह बोला: महाराज ! क्या बताऊँ ? सब कुछ तबाह हो गया है। विदेशों से जो जहाज माल से लदा हुआ था, वह समुद्र में गर्क हो गया है। मैं तबाह हो गया गुरूदेव। दीवाला निकाले बिना कोई रास्ता नजर नहीं आता और इस बेइजती से अच्छा में मौत को कबूल कर लूँ, लेकिन आपका फरमान है कि आत्मघाती महा अपराध है इसलिए आपकी शरण में आया हूँ। सवरन शाह ने बड़े ही दर्दनाक शब्दों में अपनी दीन दशा का ब्यान कर दिया। कबीर जी हँसते हुए कहने लगे: "सवरन शाह" ! यह बताओ कि कितनी माया मिल जाए कि तुम्हारी इज्जत बच जाए, शायद हमारे राम जी कुछ व्यवस्था कर दें। वह कबीर जी की ऐसी बातें सुनकर अवाक रह गया और सोच के गहरे समुद्र में गोते लगाने लगा। तभी कबीर जी ने उससे दुबारा वही प्रश्न कर दिया। सवरन शाह बोला: गुरूदेव जी ! कम से कम दस हजार मोहरें हों तो इज्जत बच सकती है। इतनी रकम की हूण्डी तो एक दो दिन में ही भरनी हैं। अगर भरूँगा नहीं तो दिवाला निकालना पड़ेगा और इसका मतलब होगा मौत।

कबीर जी ने नवाब से कहा: बिजली खान ! भक्त रविदास जी के यहाँ से लाया हुआ वह हीरा सवरन को दे दो। बिजली खान ने ऐसा ही किया। सवरन शाह बोला: परन्तु महाराज ! यह हीरा तो कम-से-कम पचास हजार मोहरों का है और मेरी जरूरत तो केवल दस हजार मोहरों की है। यह सुनकर बिजली खान बूरी तरह चौंक गया। कबीर जी ने कहा: सवरन शाह ! यह हीरा रख लों और जो बचे वह जरूरतमंदों में बाँट देना। सवरन वह हीरा लेकर चला गया। बिजली खान कबीर जी के चरणों में गिर गया और माफी माँगने लगा: कि हे गुरूदेव ! मुझे क्षमा कर दो। कबीर जी हँसकर बोले: हे भक्त ! अहँकार बूरी बला है यह इन्सान का कुछ भी नहीं बनने देता, इसलिए इससे बचकर रहो और किसी भी हालत में इसे आगे नहीं आने दो। चाहे आप दौलतमँद हों, परन्तु भक्तों को दौलत की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि उनकी हर जरूरत को पूरा करने के लिए उनका राम तत्पर रहता है। इसलिए उनको किसी भी चीज की कमी नही आती। नवाब बिजली खान पठान के कपाट खुल गए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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