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42. आत्मधाती महा अपराधी

आत्मघात एक महा अपराध है। जो आत्मा, परमात्मा के द्वारा दी गई देह का आत्मघात करती है, उसे कभी भी शान्ति नसीब नहीं होती और भटकती रहती है। यह बात सभी महापुरूष बताते हैं। कबीर जी ने भी आत्मघाती को महा अपराधी करार दिया है। एक दिन उनके सुपुत्र संत कमाल जी ने संगत को एक साखी अपने पिता जी के संबंध में सुनाई। उन्होंने फरमाया कि एक दिन पहर दो तड़के कबीर जी गँगा स्नान करके वापिस आ रहे थे कि उन्होंने एक जवान को गँगा में छलाँग मारकर गँगा की लहरों में गुम होते हुए देखा। वह समझ गए कि इस कमबख्त ने आत्महत्या के लिए गँगा में छलाँग लगाई है। पिता जी (कबीर जी) ने गँगा में वस्त्र उतारकर छलाँग लगाई और उसे बचाकर ले आए। वह बेहोश था। उसे घर पर लेकर आए और उसके पेट में से पानी निकाला गया और उसे होश में लाया गया और उसके कपड़े बदले गए और उसे गर्म दूध पीने के लिए दिया गया। जब उसकी हालत सामान्य हो गई तो कबीर जी ने उससे पूछा: भक्त जन ! यह क्या पाप करने जा रहा था ? यह सुनकर वह युवक बहुत जोर-जोर से रोने लगा। कबीर जी ने कहा: बेटा ! यह सँसार का जँजाल सममुच बहुत कठिन है परन्तु राम जी के चरणों का आसरा लेकर इसमें से ही सुखों की प्राप्ति हो सकती है। शुभ संगत में शामिल होने से यह कलेश पँख लगाकर उड़ जाते हैं। दुखी न हो, यह बताओ कि यह पाप क्यों करने जा रहे था, तुम्हे क्या कष्ट है ? उसने बताया: मेरा नाम चेतन है और आत्मघात के यत्न का कारण बताया कि घर में सख्त कलेश रहता है। आमदनी कुछ कम हो गई है इस कारण कुछ कर्जा चड़ गया है। पिछले साल मेरी दुकान में चोरी हो गई थी और जब से हालत पतली से पतली होती जा रही है। लेकिन महाराज ! यह मुसीबत ऐसी नहीं है कि जिसे में सहन न कर सकूँ। परन्तु बड़ी दुखदाई बात तो यह है कि मेरी पत्नी जो पहले मेरे साथ प्रेम करती थी, वह अब मुझसे नफरत करने लग गई है, मेरे साथ मन्दा बोलती है और दुतकारती रहती है। निखट्टू कहकर डाँटती है, जिससे शहर के लोग भी मुझसे नफरत करने लगे हैं, इसलिए मुझको अपने आप से नफरत होने लगी है और मैंने जीने से मरना अच्छा समझकर ही आत्महत्या करने के लिए गँगा में छलाँग लगाई थी। चेतन दास की यह दुखभरी वार्त्ता सुनकर कबीर जी ने उसको धीरज दिया और अपने पास ठहरने के लिए कहा। वह उन्हीं के पास रहने लगा और राम नाम की तरफ प्रेरित होने लगा। कबीर जी ने उसको अलग से ज्ञान देने की ब्जाय संगत में बैठे हुए सभी के साथ उपदेश देते हुए ही उसके कल्याण का सामान पैदा कर दिया। एक दिन कबीर जी फरमाने लगे:

मन माने लोगु न पतीजै ।।
न पतीजै तउ किआ कीजै ।। अंग 656

अर्थ: भक्त जनो, प्रमीयों ! अगर अपना मन मान जाए और लोग ना मानें तो लोगों की परवाह नहीं करनी चाहिए। लोग अगर मजाक बनाते हैं ता उनकी तरफ ध्यान नहीं दो। जो आपने ठीक समझ लिया है, वह राम का नाम लेकर करते जाओ। नफरत का उत्तर नफरत नहीं होता और ना ही आग से आग बूझ सकती है। घर में जब कोई तुम्हारे पर गुस्सा है तो उसका गुस्सा नरमी से ठँडा करो। गुस्से का उत्तर गुस्से से देने से आप भी पागल हो जाओगे और दूसरे को भी पागल कर दोगे। घर में बहुत से कलेश गुस्से की आग पर क्रोध का तेल डालने से ही भड़कते हैं और यही पागलपन का कारण बनता है और इन्सान आत्महत्या करने के लिए तैयार हो जाता है। जब आग के स्थान पर नम्रता रूपी अमृत जल डाला जाए तो कलेश सुख में बदल जाते हैं।

क्रोध अगनी सँसार में सारे सुख जलाइ ।।
कहे कबीर पुरश गिआनी नहीं कलेश बड़ाइ ।।

यह उपदेश सुनकर चेतन दास की आँखों में पानी आ गया। उसको इस सच्चाई का ज्ञान इस ज्ञानमयी शब्द से पहली बार हुआ कि कसूर केवल उसकी पत्नी का ही नहीं था बल्कि उसका भी था। वह गुस्से होती थी और मैं आगे से उससे दुगूना गुस्सा होता था और क्रोध में उत्तर देता था, इस कारण झगड़ा बड़ता गया। तभी चेतन उठा और कबीर जी के चरणों में आकर माफी माँगने लगा और कहने लगा: महाराज ! मैं अपराधी हूँ मुझे बक्श लो। कबीर जी ने कहा: कि भक्त जनों ! अपने घर जा और अपनी पत्नी और बच्चों की देखभाल कर। चेतन दास बोला: महाराज जी ! मैं अपनी पत्नी के पास किस मूँह से जाऊँ ? मेरी गल्ती थी। तभी माता लोई जी जो कि कबीर जी की पत्नी थी। एक महिला का हाथ पकड़कर उसके पास लाई। यह चेतन की पत्नी थी। पत्नी ने पहले कबीर जी के चरण छूए, फिर अपने पति चेतनदास के पैर पकड़ लिए और कहने लगी– पति परमेश्वर जी ! गल्ती मेरी थी, मुझे माफ कर दो। दोनों का पश्चात्ताप सामने आ गया और दोनों के मन की मैल धूल गई। नफरत की आग बूझ गई और प्रेम का कमल खिल गया। कबीर जी ने फरमाया: कि भक्तों ! घर जाओ, राम और राम जी का नाम दिल में बसाओ शुभ कर्म करो और सब्र और संतोष से बाँट कर खाओ। लालच पापों का मूल है और पाप बर्बादी का कारण बनता है। घर गृहस्थी के लिए आदमी पाप करता है, कपट करता है। फिर क्योंकि कमाई कपट की होती है इसलिए घर में भी कलेश पैदा कर देती है। इसलिए ध्यान से सुनो:

बहु परपंच करि पर धनु लिआवै ॥ सुत दारा पहि आनि लुटावै ॥१॥
मन मेरे भूले कपटु न कीजै ॥ अंति निबेरा तेरे जीअ पहि लीजै ॥१॥ रहाउ ॥
छिनु छिनु तनु छीजै जरा जनावै ॥ तब तेरी ओक कोई पानीओ न पावै ॥२॥
कहतु कबीरु कोई नही तेरा ॥ हिरदै रामु की न जपहि सवेरा ॥३॥९॥ अंग 656

आँतरिक अर्थ: हे प्राणी ! जो तूँ कई प्रकार के कपट और पाप करके पत्नी और पुत्र व पुत्री आदि के लिए धन लेकर आता है और इन पर लूटाकर खुश होता है। यह बूरी बात है। अंत में इसका सारा लेखा तुझे ही देना पड़ेगा। उम्र बीतेगी और शरीर निर्बल हो जाएगा फिर किसी ने पानी भी नहीं पूछना। मतलब कबीर जी का यह है कि पापों की कमाई अर्थात चोरी और ठगी कभी भी नहीं करनी चाहिए, इससे आखिर में न तो लोक में सुख होता है और ना ही परलोक सँवरता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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