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38. नेकी का बदला नेकी

एक दिन कबीर जी की संगत में नेकी की चर्चा चल रही थी। श्री धर्मदास ने कहा: कि महाराज जी ! आप फरमाते हो कि गैरों से भी नेकी करना अपने साथ नेकी करना है। क्या यही कर्मयोग का आर्दश है। कबीर जी ने कहा: बेशक ही ! यह आर्दश योग है नेकी का फल हमेशा नेकी के रूप में ही मिलता है। इस पर मुक्ता मुनी ने कहा: कि महाराज जी ! इस सच्चाई को कोई मिसाल देकर समझाओ। कबीर जी ने कहा: कि अच्छा तो सुनो ! अफ्रीका की बात है। जिसके जँगलों में शेर भारी गिनती में होते हैं। जिस समय की यह बात है उस समय उस देश में अमीर आदमियों के पास बहुत सारे गुलाम होते थे। एक-एक अमीर आदमी के पास लगभग 10-10 या 20-20 या इससे भी अधिक। इन गुलामों की हालत जानवरों से किसी भी तरह अच्छी नहीं होती थी। उनसे जानवरों की तरह काम लिया जाता था और जानवरों की तरह ही खाने को दिया जाता था। दुखी होकर यदि कोई गुलाम भाग जाता और फिर पकड़ा जाता तो उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था। उसे बाँधकर जँगल में फैंक दिया जाता था और शेर आकर उसे खा जाता था। जो भी इस प्रकार से बाँधकर जँगल में फैंका जाता था वह कभी भी शेर से बच नहीं पाया। एक बार की बात है, गेरो नाम का एक गुलाम अपने मालिक के अत्याचारों से छुटकारा हासिल करने के लिए भाग निकला और दूसरे राज्य की और दौड़ा। रास्ते में भयानक जँगल पड़ता था जब वह उस जँगल में से निकल रहा था तो उसने एक शेर को पेड़ के नीचे तड़पते हुए देखा। गेरो को उस पर तरस आ गया। शेर उसकी तरफ इस प्रकार से देख रहा था जैसे बिल्ली बनकर उससे रहम की भीख माँग रहा हो। गेरो निडर बनकर उसके करीब चला गया। उसने देखा शेर के अगले दोनों पँजों में बड़े-बड़े काँटें घुसे हुए हैं और इस कारण वह चलने के योग्य नहीं रहा और पीड़ा के कारण उसकी जान निकल रही थी, गेरो ने अपने सिर की पगड़ी निकालकर उस शेर के पँजे साफ किये और फिर बारी-बारी से पँजों में से सारे काँटे निकाल दिए। काँटें निकालने से शेर की पीड़ा भी कम हो गई और वह चलने योग्य भी हो गया। उसने गेरो की और धन्यवाद भरी नजरों से देखा और जँगल में फिर एक तरफ चला गया।

गेरो शेर के साथ नेकी करके जँगल पार करके दूसरे राज्य की और चल दिया। परन्तु उसका मालिक बहुत सारें गुलामों को लेकर आ गया और पीछा करते हुए गेरो को पकड़ लिया और उसे मौत की सजा सुनाते हुए बाँधकर जँगल में डाल दिया। वहाँ पर वो ही शेर जिसके पैरों में से गेरो ने काँटे निकाले थे। गरजता हुआ वहाँ पर पहुँच गया। काँटों के कारण वह पिछले दो दिनों से कोई भी शिकार नहीं कर पाया था और भूख से उसकी जान निकल रही थी। वह जल्दी से गेरो का शिकार करने के लिए आगे बड़ा। परन्तु जब उसने गेरो को देखा तो उसने उसे पहचान लिया कि यह तो वही है, जिसने मेरे पँजों में से काँटे निकाले थे। शेर ने अपने तीखे दाँतों से गेरो के रस्सी से बँधे हुए बँधन काट डाले। गेरो जब बँधनों से आजाद हो गया तो शेर इस प्रकार से अपना सिर उसकी गोदी में रखकर बैठ गया जिस प्रकार किसी अति निकटवर्ती स्नेही का स्वागत किया जाता है। गेरो ने भी उस शेर को पहचान लिया कि यह वही शेर है जिसके पँजों में से उसने काँटें निकाले थे। वह समझ गया कि यह दुशमन नहीं दोस्त है और वह उसको प्यार करने लगा। फिर शेर उठ खड़ा हुआ और गेरो के चोले का पल्ला पकड़कर उठाया और बैठकर अपनी पीठ पर बैठने के लिए ईशारा किया। गेरो समझ गया कि वह उसे अपनी पीठ की सवारी करने के लिए कह रहा है। वह उसकी पीठ पर बैठ गया। शेर उसको जँगल के पार ले गया और उसको उस राज्य की सीमाओं से बाहर छोड़ आया, जिसमें गेरो का अत्याचारी मालिक रहता था। कबीर जी ने मुक्ता मुनी को यह साखी सुनाकर कहा: भक्त जनों ! देखों नेकी को खूँखार जानवर भी नहीं भूलते और उसका बदला जरूर देते हैं। इसलिए यह समझ लो कि किसी के साथ भी की गई नेकी कभी अकारथ नही जाती उसका फल जरूर मिलता है।

नेकी कीती कभी भी, नहीं अकारथ जाइ ।।
कह कबीरा नेकीआं ते मिठा फल खाइ ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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