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37. मुक्ता मुनी जी

जब मुक्ता मुनी जी के माता पिता आकर कबीर जी के चेले बने तब उनकी आयु बहुत छोटी थी। बहुत ही छोटे खिलोने से खेलने की उम्र थी फिर भी वो ही करते जो और सँगत और माता-पिता को करते हुए देखते थे। ओरों की देखा-देखी उन्होंने ने भी एक दिन कबीर जी के चरण छू लिए। कबीर जी ने निहाल होकर पूछा: अरे प्यारे बच्चे ! प्यारा बच्चा क्या माँगता है ? बताओ हम आपको क्या दें ? नन्हें से मुक्ता मुनी कबीर जी की यह बात सुनकर बहुत ही खुश हुए। परन्तु उसके बाल दिल को यह बात समझ नहीं आ रही थी कि वह माँगे तो क्या ? खाने-पीने और खेलने के लिए माता पिता की और से सब कुछ मिल जाता है। फिर उसमें से क्यों माँगा जाए। नन्हा सा मुक्ता मुनी इन्हीं सोचों के सागर में डूब गया। कबीर जी ने फिर पूछा: बताओ बच्चे ! आपके क्या दें ? नन्हें से मुक्ता मुनी जी ने कहा: मूझे पता नहीं कि क्या माँगू ! आप जी मूझे ऐसी चीज दे दो जो कि सब से अच्छी हो। अब कबीर जी के सोचने की बारी थी। वह सोचने लगे कि वह सबसे अच्छी चीज क्या हो सकती है जो कि नन्हें से मुक्ता मुनी को दी जाए। उनका फैसला यह था कि प्यार ही सँसार की सबसे अच्छी वस्तू है और जब यह प्यार गुरू का हो तो उससे अच्छी वस्तू क्या हो सकती है। कबीर जी की नजर मुक्ता मुनी जी से मिली। वह नजर कि जिससे प्यार का भण्डार भरपूर था। मुक्ता मुनी जी का दिल बाग-बाग हो गया। वह निहाल हो गया। गुरू उसके दिल में बस चुके थे। कबीर जी कहते हैं–

जा के मन में गुरू बसे वडभागी जीउ ।।

कबीर जी ने कहा: मूक्ता जी ! तुझे वो चीज मिलेगी जो सबसे अच्छी है और जो केवल ऋषि मूनियों को ही प्राप्त होती है। बेपरवाही, निडरता और पूरन शान्ति, क्यों अब खुश है ना ! जा अब जाकर खेल। मुक्ता मुनी खुशी के साथ नाच उठा। उसने फिर कबीर जी के चरणों में सिर झूकाया और खेलने के लिए चल दिया। यह देखकर श्री धर्मदास जी हैरान हो गए। मुक्ता मुनी के जान के बाद बोले कि: महाराज ! यह बालक तो बहुत ही भाग्यशाली निकला है। जो बिना कुछ किए ही आपकी मेहर का पात्र बन गया है। कबीर जी ने कहा: भक्त जी ! धर्म-कर्म से जो चीज मिलती है। उसमें ठहराव कहाँ होता है। वो तो मजदूरी होती है और मजदूरी की रकम हमेशा तो पास नहीं रहती। खर्च कर दी जाती है, खत्म हो जाती है। असल चीज तो श्रद्धा और प्रेम की कमाई है, जो सदा रहती है, इसमें ठहराव होता है। यह सुनकर धर्मदास जी बोले: कि गुरू जी ! यह बच्चा इन बातों को क्या समझ सकता है ? इसके लिए तो यह बहुत कठिन हैं। कबीर जी मुस्कराकर बोले: भक्त ! अगर इस बच्चे के दिल में यह सब कुछ ना होता तो इस तरह आकर सबसे अच्छी चीज क्यों मांगता ? अगर उसमें यह सब कुछ नहीं होता तो उसकी माँग खिलौनों और मिठाईयों से आगे नहीं बड़ती। इस बालक में वह सब कुछ है। नाम अभ्यास उसे पूर्णता की तरफ ले जाएगा। उसको इसके लिए बहुत मौका मिलेगा। उस दिन से मुक्ता मुनी कबीर जी की सँगत में रहने लगे। जिससे उनका आत्मिक विकास बड़ी तेजी से होने लगा कि धर्मदास जी को उसके आगे सिर झूकाना पड़ा। आमन देवी जी का मुक्ता मुनी के साथ बहुत स्नेह हो गया। एक दिन उसने बाल मुक्ता मुनी को कहा: मुक्ता जी ! जो सलूक माता अपने बच्चों से करती है। वह कबीर जी अपने चेलों के साथ करते हैं। मुक्ता मुनी यह सुनकर बड़े खुश हो गए और कबीर जी के पास विनती करने लगे: महाराज ! मेरे कल्याण के लिए कुछ उपदेश किया करो। कबीर जी ने उससे कहा: बेटा ! दिल में राम नाम बसाओ और नेकी के रास्ते पर चलो तो किसी और उपदेश की जरूरत नहीं रह जाती। कबीर जी ने उसकी आत्मिक शुद्धि और शान्ति के लिए बाणी का उच्चारण किया:

संत सरन चित जग हितकारी ।। संत दया मऐ जगत भिखारी ।।
तरल सुभाउ संत जन रंजन ।। दुख खंजन तिहे दोस विभंजन ।।
गुरवे गुरू की आसा राखे ।। गुरू का नाम निरंतर भाखे ।।
गुरू का नाम गुरू का रूप ।। जो कोई लऐ सो परम अनूप ।।
जा पर किरपा द्रिसटी गुर करे ।। छिन में जगत दोस सभ हरे ।।
मन मलीन मुकती दिलावे ।। जीउ निरमल संत पद पुचावे ।।
जीउ हिरदे जब आन बिराजे ।। अनहद धुनी मन अंतर गाजे ।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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