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36. कबीर जी की चेली आमन

आमन देवी श्री धर्मदास जी की पत्नी थी। यह बहुत ही सूझ-बूझ वाली थी। जब उसने अपने पति को कबीर जी के भक्ति रँग में डूबा हुआ देखा तो वह भी भक्ति के ज्ञान का अमृत पीने के लिए उतावली हो उठी। परन्तु संगत के सामने उसकी जुबान नहीं खुलती थी। औरत को इस देश में आरम्भ से ही कहा गया है कि वह कमजोर है, अपवित्र है और इसलिए उसे मर्दों की तरह प्रभू की भक्ति करने का अधिकार नहीं है। यही शँका आमन देवी जी के दिल में भी बैठी हुई थी। परन्तु कबीर जी तो अर्न्तयामी थे। उन्होंने अपने सतसंग में यह बातें कहीं कि आदमी और औरत की आत्मा एक जैसी है। जितनी आत्मिक दशा आदमी की ऊँची जाती है। औरत की उससे भी ऊँची जा सकती है। जरूरत है तो दिल में शमा जलाने की यानि की अहँकार त्यागकर सेवा भाव में आने की। आमन देवी बहुत धनी थी, जिस कारण उसमें सेवा भाव का घाटा था। परन्तु कबीर जी महाराज जी की सँगत में बैठने से उसके दिल में सेवा भाव और नम्रता का भण्डर भरपूर हो गया। एक दिन जब कबीर जी ने उसको राम नाम जपते हुए संगत के झूठे बर्तन साफ करते हुए देखा तो अनुभव किया कि इसकी आत्मा अपनी पहचान करने के लिए और परमात्मा में अभेद होने के लिए उतावली हो रही है। यह देखकर उन्होंने गुरू दीक्षा दी और चेली बना लिया। यह कहा जाता है कि आमन देवी कबीर जी की पहली चेली थी। परन्तु कई ग्रँथों में यह भी लिखा मिलता है कि कबीर जी की पहली चेली उनकी पत्नी माता लोई जी थीं और आमन देवी जी का नम्बर दूसरा आता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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