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2. कबीर जी के बचपन के कौतक की साखी

कबीर जी के समय को भक्ति का समय कहा जाता है। उस समय सारे भारत में भक्ति की लहर जोरों पर थी, भक्ति लहर के जोरों पर होने का कारण मुस्लमानों का हिन्द में आना और हिन्दूओं पर जूल्म करना था। जो भी मुस्लमान हाकिम बनता वो ही हिन्दूओं को मुस्लमान बनाने और मँदिर गिराकर मस्जिद बनाने में अपनी अक्ल, दौलत और शक्ति खर्च करता। यही कारण था कि राजा हरीचँद की नगरी काशी जैसे महापवित्र हिन्दू तीर्थ और शहर में भी मुस्लमानों की गिनती बहुत थी चाहे वह शहर में बहुत गरीब थे पर हाकिम कम थे। बनारस का थानेदार मुस्लमान था। निची जात के लोगों का मुस्लमान बनने का कारण ब्राहम्ण मत का जोर था। ब्राहम्ण मत नीची जात वालों से तिरस्कार का व्यवहार करते थे। चार वर्णों का जोर था। शुद्र को कोई भी मन्दिर में नहीं जाने देता था। पर जो कोई हिन्दूस्तानी मुस्लमान बन जाता तो उसके साथ अच्छा सलूक किया जाता था, क्योंकि इस्लाम धर्म राज का धर्म था। राज धर्म होने के अलावा इस्लाम धर्म में बहुत समानता भी थी। नये बने मुस्लमानों के दिलों में से हिन्दू सँस्कृति दूर नहीं हुई थी। उनके मुँह से राम आदि अपने आप निकल जाता था। इसी बीच जब कबीर जी ढाई साल के हुये तो उसने कौतक देखकर सब हैरान होने लगे। वह राम ! राम ! बोलते। तब हुकुमत के डर से माता नीमा उसको रोकती और कहती कि बेटा ! हम मुस्लमान हैं हमने अल्लाह कहना है। पर कबीर जी नहीं मानें वह बालकों के साथ खेलते हुए भी कई बार गाने लगते। उनकी सुरीली आवाज बहुत ही प्यारी थी, इसलिए जब वह गाते तो सारे प्रेम और श्रद्धा से सुनते। बालकों को बालक बड़े प्यारे होते हैं। एक दिन एक बालक जो कबीर जी के साथ खेला करता था, वह सख्त बीमार हो गया और उसके बचने की कोई आस नहीं रही। कबीर जी उसके घर पर गये और बीमार बच्चे की माँ ने बताया कि उसका साथी सख्त बीमार है वह खेल नहीं सकता। यह सुनकर कबीर जी वापिस नहीं गये और अपने साथी रहीम के पास पहुँच गये और हाथ पकड़कर बोले– रहीम ! सोया क्यों है, उठता क्यों नहीं ? तुझे क्या हुआ है ? कबीर जी यह बात सुनकर रहीम ने आँखें खोल लीं और उसने जैसे ही कबीर जी की तरफ देखा तो उसकी आधी बीमारी दूर हो गई और वह धीरे-धीरे उठकर बैठ गया। रहीम की माँ यह कौतक देखकर हैरान रह गई। कबीर जी ने अपना हाथ रहीम के हाथ में देकर उसका हाथ पकड़ लिया। हाथ छूते ही वह तुरन्त स्वस्थ हो गया और बिस्तर से उठ बैठा। उसकी माँ ने जब यह देखा तो वह कबीर को उस दिन से परमात्मा का रूप समझने लगी। उसने रहीम के ठीक होने की कहानी पुरे मोहल्ले की औरतों को सुनाई जिसे सुनकर सभी आश्चर्य में पड़ गईं। बालक रूप कबीर जी तन से बहुत ही सुन्दर थे। उनका भोला और गोरा चेहरा नुरो-नूर था। वह तोतली जुबान से जब बचन करते तो मन को बहुत भाते। जब आप चार साल के थे तब एक दिन बालकों को साथ लेकर एक बोहड़ के नीचे थड़े पर बैठकर राम राम का उच्चारण कर रहे थे कि तभी मौहल्ले का मुल्ला आ निकला। उसने बालकों को डाँटा कि तुम मुस्लमान के लड़के हो के राम राम क्यों बोल रहे हैं। कबीर जी ने उसे बड़े ही हौंसल्ले से कहा– राम रहीम, भगवान और खुदा में क्या फर्क है ? और साथ ही यह बाणी भी बोली:

बुत पूजि पूजि हिंदू मूए तुरक मूए सिरु नाई ॥
ओइ ले जारे ओइ ले गाडे तेरी गति दुहू न पाई ॥१॥
मन रे संसारु अंध गहेरा ॥
चहु दिस पसरिओ है जम जेवरा ॥१॥ रहाउ ॥
कबित पड़े पड़ि कबिता मूए कपड़ केदारै जाई ॥
जटा धारि धारि जोगी मूए तेरी गति इनहि न पाई ॥२॥
दरबु संचि संचि राजे मूए गडि ले कंचन भारी ॥
बेद पड़े पड़ि पंडित मूए रूपु देखि देखि नारी ॥३॥
राम नाम बिनु सभै बिगूते देखहु निरखि सरीरा ॥
हरि के नाम बिनु किनि गति पाई कहि उपदेसु कबीरा ॥४॥१॥ अंग 654

अर्थ: बुत की पूजा कर-करके हिन्दू मर गए और मुस्लमान सिर निवा-निवा कर (सजदा करके) मर गए। मौत होने पर हिन्दू जला देते हैं और मुस्लमान गाढ़ देते हैं पर परमात्मा का भेद दोनों ही नहीं जान पाते। भाव यह है कि मरन और जन्म की रस्मों को हिन्दू और मुस्लमान करते हैं। सारा सँसार अंधेरे में धक्के खा रहा है। चारों तरफ यमदूतों का भय है। जीव कुकर्म करता हुआ यमलोक जाता है। राजाओं के दरवाजे पर जाकर कविजन कविता पढ़-पढ़ कर वाह-वाही लूटते हैं। जोगी तपस्वी और महात्मा लम्बी जटाऐं रखते हैं। इन सबमें से कोई भी परमात्मा की गति नहीं पा सकता, क्योंकि वो लम्बी जटाऐं तो रख लेते हैं परन्तु परमात्मा की भक्ति और लोक सेवा नहीं करते। कई राजाओं ने दौलत जमा की, हीरे मोतियों के खजाने भर लिए। कई पण्डितों ने वेदों शास्त्रों के पाठ किए पर स्त्री के रूप में फँसकर अपने आप को गवा बैठे। सची बात कहता हूँ– हे जीव ! राम नाम सिमरन किए बिना कभी गुजारा नहीं हो सकता। बेशक परखकर देख लो। क्या किसी ने भक्ति किये बिना मुक्ति प्राप्त की है ? कबीर जी का ठीक उपदेश है कि पाखण्ड छोड़कर भक्ति करो तो मुक्ति प्राप्त होगी।

मुल्ला कुछ भी नहीं बोल सका। वह बिना बोले वहाँ से चुपचाप गुस्से में चला गया। कबीर जी हँस पड़े। उसके हँसने से सारे बालक भी खिलखिला कर हँस पड़े। मुल्ला सीधा नीरो के पास पहुँचा और उसने नीरो को डाँटकर कहा: अपने लड़के को सम्भाल ! वो इस्लाम के विरूद्ध जा रहा है। वह अपने साथी बालकों को भी यही सिखा रहा है। वह राम राम कहता है। अगर काजी को पता लग गया तो वह सवाल-जवाब करेगा। नीरो कुछ डर गया उसने मुल्ला को हाथ जोड़कर उत्तर दिया कि: अभी कबीर मासूम बच्चा है। समझायेगें तो समझ जायेगा। कबीर जी जब घर आये तो नीरो जी ने उसे लाड प्यार से समझाया कि कबीर ! भजन ना गाया कर, मौलवी मारेगा। भजन तो हिन्दू गाया करते हैं और हम मुस्लमान हैं। तुम राम न बोला करो और खुदा या अल्लाह कहा करो। कबीर जी तन से जरूर बालक थे परन्तु वह मन से ब्रहम ज्ञानी थे। वह बोले: अल्लाह ! राम !

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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