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8. थिती व थिंती

थिती का भाव तिथी तारीख या समय है। श्री गुरू ग्रँथ साहिब जी में गुरू नानक पातशाह व गुरू अरजन देव जी की रचनाएँ इस शीर्षक के नीचे दर्ज हैं। असल में इन दोनों रचनाओं का मूल भाव भारतीय परम्परा के लोगों को थित-वारों की उलझन से बाहर निकालना और शुभ का ज्ञान कराना था। गुरू साहिब ने भ्रम के मुकाबले भक्ति, ज्ञान, सेवा व सिमरन का उपदेश दिया और हर समय को पवित्र स्वीकार किया। भक्त कबीर जी की एक रचना ‘थिंती’ है जो गउड़ी राग में दर्ज है। इसमें भक्त कबीर जी ने पुरानी रूढ़ियाँ व भ्रमों का नाश कर प्रभु के नाम सिमरन को ही असल राह बताया है।


उदाहरण के लिएः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु गउड़ी थितीं कबीर जी कीं ॥ सलोकु ॥
पंद्रह थितीं सात वार ॥ कहि कबीर उरवार न पार ॥
साधिक सिध लखै जउ भेउ ॥ आपे करता आपे देउ ॥१॥ थितीं ॥
अमावस महि आस निवारहु ॥ अंतरजामी रामु समारहु ॥
जीवत पावहु मोख दुआर ॥ अनभउ सबदु ततु निजु सार ॥१॥
चरन कमल गोबिंद रंगु लागा ॥
संत प्रसादि भए मन निर्मल हरि कीर्तन महि अनदिनु जागा ॥१॥ रहाउ ॥
परिवा प्रीतम करहु बीचार ॥ घट महि खेलै अघट अपार ॥
काल कलपना कदे न खाइ ॥ आदि पुरख महि रहै समाइ ॥२॥
दुतीआ दुह करि जानै अंग ॥ माइआ ब्रह्म रमै सभ संग ॥
ना ओहु बढै न घटता जाइ ॥ अकुल निरंजन एकै भाइ ॥३॥
त्रितीआ तीने सम करि लिआवै ॥ आनद मूल परम पदु पावै ॥
साधसंगति उपजै बिस्वास ॥ बाहरि भीतरि सदा प्रगास ॥४॥
चउथहि चंचल मन कउ गहहु ॥ काम क्रोध संगि कबहु न बहहु ॥
जल थल माहे आपहि आप ॥ आपै जपहु आपना जाप ॥५॥
पांचै पंच तत बिसथार ॥ कनिक कामिनी जुग बिउहार ॥
प्रेम सुधा रसु पीवै कोइ ॥ जरा मरण दुखु फेरि न होइ ॥६॥
छठि खटु चक्र छहूं दिस धाइ ॥ बिनु परचै नही थिरा रहाइ ॥
दुबिधा मेटि खिमा गहि रहहु ॥ करम धरम की सूल न सहहु ॥७॥
सातैं सति करि बाचा जाणि ॥ आतम रामु लेहु परवाणि ॥
छूटै संसा मिटि जाहि दुख ॥ सुंन सरोवरि पावहु सुख ॥८॥
असटमी असट धातु की काइआ ॥ ता महि अकुल महा निधि राइआ ॥
गुर गम गिआन बतावै भेद ॥ उलटा रहै अभंग अछेद ॥९॥
नउमी नवै दुआर कउ साधि ॥ बहती मनसा राखहु बांधि ॥
लोभ मोह सभ बीसरि जाहु ॥ जुगु जुगु जीवहु अमर फल खाहु ॥१०॥
दसमी दह दिस होइ अनंद ॥ छूटै भरमु मिलै गोबिंद ॥
जोति सरूपी तत अनूप ॥ अमल न मल न छाह नही धूप ॥११॥
एकादसी एक दिस धावै ॥ तउ जोनी संकट बहुरि न आवै ॥
सीतल निर्मल भइआ सरीरा ॥ दूरि बतावत पाइआ नीरा ॥१२॥
बारसि बारह उगवै सूर ॥ अहिनिसि बाजे अनहद तूर ॥
देखिआ तिहूं लोक का पीउ ॥ अचरजु भइआ जीव ते सीउ ॥१३॥
तेरसि तेरह अगम बखाणि ॥ अर्ध उरध बिचि सम पहिचाणि ॥
नीच ऊच नही मान अमान ॥ बिआपिक राम सगल सामान ॥१४॥
चउदसि चउदह लोक मझारि ॥ रोम रोम महि बसहि मुरारि ॥
सत संतोख का धरहु धिआन ॥ कथनी कथीऐ ब्रह्म गिआन ॥१५॥
पूनिउ पूरा चंद अकास ॥ पसरहि कला सहज परगास ॥
आदि अंति मधि होइ रहिआ थीर ॥
सुख सागर महि रमहि कबीर ॥१६॥ अंग 343

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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