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20. सलोक सहसकृति

यह उन सलोकों का शीर्षक है जो सँस्कृत भाषा की रँगत को रूपमान करते हैं। गुरू साहिब के समय कई भाषाओं का प्रयोग होता था जिनमें धार्मिक लोग प्रायः गाथा या सहसकृति का प्रयोग करते थे। यह प्रायः सारे हिन्दुस्तान में ही समझी जाती थी। अगर बहुत ही सरल ढँग से इसे ब्यान करना हो तो हम कह सकते हैं कि देशी व सँस्कृत का मिलाजुला रूप सहसकृति है। गुरू पातशाह ने इन सलोकों में जहाँ कर्मकाण्डों का निषेध किया है, वहाँ प्रभु से एकसुरता कायम करने और सामाजिक रिश्तों की नाशमानता को रूपमान किया है। इसके साथ ही मनुष्य जीवन का एक ही निशाना ‘गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ’ निश्चित किया है।

उदाहरण के लिएः (1)
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
सलोक सहसक्रिती महला १ ॥ पड़्हि पुस्तक संधिआ बादं ॥
सिल पूजसि बगुल समाधं ॥ मुखि झूठु बिभूखन सारं ॥
त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥ गलि माला तिलक लिलाटं ॥
दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥ जो जानसि ब्रहमं करमं ॥
सभ फोकट निसचै करमं ॥ कहु नानक निसचौ ध्यावै ॥
बिनु सतिगुर बाट न पावै ॥१॥
निहफलं तस्य जनमस्य जावद ब्रह्म न बिंदते ॥
सागरं संसारस्य गुर परसादी तरहि के ॥
करण कारण समरथु है कहु नानक बीचारि ॥
कारणु करते वसि है जिनि कल रखी धारि ॥२॥
जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं त ब्राहमणह ॥
ख्यत्री सबदं सूर सबदं सूद्र सबदं परा क्रितह ॥
सरब सबदं त एक सबदं जे को जानसि भेउ ॥
नानक ता को दासु है सोई निरंजन देउ ॥३॥
एक क्रिस्नं त सरब देवा देव देवा त आतमह ॥
आतमं स्री बास्वदेवस्य जे कोई जानसि भेव ॥
नानक ता को दासु है सोई निरंजन देव ॥४॥ अंग 1354

उदाहरण के लिएः (2) (उदाहरण के लिए केवल 5 ही लिए हैं)
सलोक सहसक्रिती महला ५
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
कतंच माता कतंच पिता कतंच बनिता बिनोद सुतह ॥
कतंच भ्रात मीत हित बंधव कतंच मोह कुट्मब्यते ॥
कतंच चपल मोहनी रूपं पेखंते तिआगं करोति ॥
रहंत संग भगवान सिमरण नानक लबध्यं अचुत तनह ॥१॥
ध्रिगंत मात पिता सनेहं ध्रिग सनेहं भ्रात बांधवह ॥
ध्रिग स्नेहं बनिता बिलास सुतह ॥
ध्रिग स्नेहं ग्रिहारथ कह ॥
साधसंग स्नेह सत्यिं सुखयं बसंति नानकह ॥२॥
मिथ्यंत देहं खीणंत बलनं ॥
बरधंति जरूआ हित्यंत माइआ ॥
अत्यंत आसा आथित्य भवनं ॥
गनंत स्वासा भैयान धरमं ॥
पतंति मोह कूप दुरलभ्य देहं तत आस्रयं नानक ॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद गोपाल क्रिपा ॥३॥
काच कोटं रचंति तोयं लेपनं रक्त चरमणह ॥
नवंत दुआरं भीत रहितं बाइ रूपं असथ्मभनह ॥
गोबिंद नामं नह सिमरंति अगिआनी जानंति असथिरं ॥
दुरलभ देह उधरंत साध सरण नानक ॥
हरि हरि हरि हरि हरि हरे जपंति ॥४॥
सुभंत तुयं अचुत गुणग्यं पूरनं बहुलो क्रिपाला ॥
ग्मभीरं ऊचै सरबगि अपारा ॥
भ्रितिआ प्रिअं बिस्राम चरणं ॥ अनाथ नाथे नानक सरणं ॥५॥ अंग 1353

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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