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10. वार सत

पँजाबी सँस्कृति में इस काव्य रूप को "सत वार", "सात वार" के नाम से जाना जाता है। जिसका भाव है सप्ताह के सात दिन। इन दिनों को आधार बनाकर किसी विशेष भावना का प्रकटाव किया जाता है। सँस्कृत में इसी शब्द को अवसर या मौके के रूप में लिया जाता है। अध्यात्मिक महापुरूषों द्वारा इस ‘सतवारे’ को अपने भीतर की प्यास के प्रकटाव का माध्यम बनाया गया है। इसके द्वारा उन्होंने इश्क-हकीकी का वर्णन करने की कोशिश की हैं पर साथ में यह भी स्वीकार करते हैं कि इस ईश्वरीय प्यार को वे शब्दों में ब्यान करने में असमर्थ हैं क्योंकि इश्क-खुदाई महसूस करना है, ब्यान करना नहीं। श्री गुरू ग्रँथ साहिब जी में ‘वार सत’ नाम की दो रचनाएँ हैं, गुरू अमरदास जी व भक्त कबीर जी की। इन दोनों रचनाओं का शीर्षक मनुष्य को तिथि-वारों के अँधविश्वास में से बाहर निकालने से सम्बन्धित है।

उदाहरण के लिएः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु गउड़ी वार कबीर जीउ के ७ ॥
बार बार हरि के गुन गावउ ॥ गुर गमि भेदु सु हरि का पावउ ॥१॥ रहाउ ॥
आदित करै भगति आर्मभ ॥ काइआ मंदर मनसा थ्मभ ॥
अहिनिसि अखंड सुरही जाइ ॥ तउ अनहद बेणु सहज महि बाइ ॥१॥
सोमवारि ससि अमृतु झरै ॥ चाखत बेगि सगल बिख हरै ॥
बाणी रोकिआ रहै दुआर ॥ तउ मनु मतवारो पीवनहार ॥२॥
मंगलवारे ले माहीति ॥ पंच चोर की जाणै रीति ॥
घर छोडें बाहरि जिनि जाइ ॥ नातरु खरा रिसै है राइ ॥३॥
बुधवारि बुधि करै प्रगास ॥ हिरदै कमल महि हरि का बास ॥
गुर मिलि दोऊ एक सम धरै ॥ उरध पंक लै सूधा करै ॥४॥
ब्रिहसपति बिखिआ देइ बहाइ ॥ तीनि देव एक संगि लाइ ॥
तीनि नदी तह त्रिकुटी माहि ॥ अहिनिसि कसमल धोवहि नाहि ॥५॥
सुक्रितु सहारै सु इह ब्रति चड़ै ॥ अनदिन आपि आप सिउ लड़ै ॥
सुरखी पांचउ राखै सबै ॥ तउ दूजी द्रिसटि न पैसै कबै ॥६॥
थावर थिरु करि राखै सोइ ॥ जोति दी वटी घट महि जोइ ॥
बाहरि भीतरि भइआ प्रगासु ॥ तब हूआ सगल करम का नासु ॥७॥
जब लगु घट महि दूजी आन ॥ तउ लउ महलि न लाभै जान ॥
रमत राम सिउ लागो रंगु ॥ कहि कबीर तब निर्मल अंग ॥८॥१॥
अंग 344

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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