पाँचवे पातशाह श्री गुरू अरजन देव साहिब जी की शहीदी के पश्तात बदली हुई स्थि‌ति के अनुसार जब बाबा बुडडा जी द्वारा छठवें गुरू श्री गुरू हरिगोबिन्द साहिब जी को मीरी पीरी राजसी एवं आध्यात्मिक की दो तलवारें पहनाकर गुरू गद्दी पर बैठाया गया तत्पश्चात गुरू जी की बढ़ रही सैनिक शक्ति आम जनता में बढ़ रही उपमा व लोहगढ़ के किले के निमार्ण के साथ-साथ श्री अकाल तखत साहिब जी में जनता की‌ शिकायतों का त्वरित निराकरण करके गुरू साहिब जी ने उचित न्याय देना प्रारम्भ किया। तब ऐसी गतिविधियों द्वारा गम्भीर नोटिस लिया गया एवं जहाँगीर के पास खतरे की झूठी रिपोर्ट भिजवाई गई। मुगल सम्राट जो पहले से ही गुरू घर के प्रति खफा था। उसने गुरू महाराज को आगरा में मिलने का सन्देश भेजा। चन्दूशाह को बहुत चिन्ता हुई। उसने राजकीय ज्योतिषी को अपने विश्वास में लिया और उसे 5000 रूपये देने निश्चित किये, जिसके अर्न्तगत वह सम्राट को भ्रम में डालेगा कि उस पर भारी विपत्ति आने वाली है क्योंकि उसके पक्ष में ग्रह नक्षत्र और इस सँकट को टालने का एक ही उपाय है कि कोई महान विभूति उसके पक्ष में 40 दिन अखण्ड जप करे।

वास्तव में जहाँगीर हिन्दु सँस्कारों में पला हुआ व्यक्ति था, उसकी किशोर अवस्था राजस्थान के राजपूत घरानों  (ननिहाल) में व्यतीत हुई थी। अतः वह पंडितों ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ा रहा था। राजकीय ज्योतिषी ने चन्दूशाह का काम कर दिया। सम्राट उसके भ्रमजाल में फँस गया। इस प्रकार सम्राट बैचेन रहने लगा कि उसका कुछ अनिष्ट होने वाला है। दरबार में मँत्रियों ने इसका कारण पुछा तो सम्राट ने बताया कि कोई ऐसा व्यक्ति ढूँढो जो मेरे लिए जप-जप किसी सुरक्षित स्थान में करे।

यह सुनते ही चन्दूशाह ने विचार रखा। इन दिनों आपके साथ ही तो हैं गुरू नानक देव जी के उत्तराधिकारी, उनसे महान और कौन हो सकता है, वही इस कार्य के लिए उपयुक्त व्यक्ति हैं। बादशाह ने गुरू जी को तुरन्त बुला भेजा, गुरू जी ने बादशाह को बहुत समझाने का प्रयास किया कि ग्रह-नक्षत्रों का भ्रमजाल मन से निकाल दो। आपके जीवन में किसी प्रकार की विपक्ति नहीं आने वाली है किन्तु वह हठ करने लगा कि नहीं कृप्या आप मेरे लिए 40 दिन अखण्ड घोर तपस्या करें। गुरू जी ने यह कार्य करना स्वीकार कर लिया। (जबकि कुछ इतिहासकार लिखतें हैं कि जहाँगीर ने गुरू जी को निमँत्रण देकर अपने पास बुलाया और धोखे से गिरफ्तार करके ग्वालियर के किले में भेज दिया गया)। ग्वालियर के किले में पहले से ही बहुत सारे हिन्दु राजा कैद थे।

गुरू जी के नूरानी प्रभाव से सभी राजा प्रसन्न और अत्यन्त प्रभावित हुए। गुरू जी के नजरबन्द होने से आम सिक्ख संगतों में चिन्ता बढ़ रही थी। बाबा बुडडा जी व भाई गुरदास जी के योग्य नेतृत्व में गुरू जी का पता लगा लिया गया। और सुबह शाम प्रभात फेरी प्रारम्भ की गई। जिससे सभी सिक्ख संगतों की हिम्मत बढ़ गई। (नोटः प्रभात फेरी की सबसे पहली चौकी ग्वालियर से मानी गई है। जिस स्थान पर अब गुरूद्वारा श्री दाता बन्दी छोड़ साहिब है)।

कई पराक्रमी सिक्ख ग्वालियर पहुँचते और किले की तरफ शीश झुकाते माथा टेकते और परिक्रमा करके वापिस लौट जाते। सामान्य तौर पर जहाँगीर कुछ भ्रमित प्रवृति का था। उक्त समय में जहाँगीर कुछ अस्वस्थ एवं परेशान रहने लगा। जिसके कारण उसकी बेगम नूरजहाँ भी उसके स्वास्थ से परेशान हो गई। बेगम नूरजहाँ गुरू घर के परम हितैषी साईं मियाँ मीर जी की मुरीद थी। जब बेगम नूरजहाँ ने साईं मियाँ मीर जी को अपनी परेशानी बताई, तब साईं मियाँ मीर जी ने उन्हें बताया कि जब तब गुरू जी ग्वालियर के किले से रिहा नहीं होंगे, उस समय तक बादशाह जहाँगीर स्वस्थ नहीं हो सकते।

परिणामस्वरूप बेगम द्वारा जहाँगीर को गुरू जी की रिहाई के लिए सहमत करके रि‌हाई संबंधी शाही आदेश भिजवाया गया। इस समय तक सभी कैदी राजाओं की श्रद्धा गुरू जी के प्रति उत्पन्न हो चुकी थी। जब गुरू जी की रिहाई का समाचार मालूम हुआ तो वह सब पहले तो प्रसन्न हुए कि किले से रिहा होने वाले आप प्रथम भाग्यशाली व्यक्ति हैं। तत्पश्चात जल्दी ही उदास हो गए। क्योंकि गुरू जी के पावन वचनों व संगत से वंचित हो जाने के भय से उनको अपनी पहले की दशा की चिन्ता खा रही थी।

गुरू जी को इस चिन्ता की जानकारी मिली तो आपने बादशाह के पास अपनी बात रखी की हम ‌अकेले रिहा नहीं होंगे, साथ में आपको इन ५२ हिन्दू राजाओं को भी रिहा करना होगा। तब जहाँगीर ने देश में अशान्ति और सम्भावित खतरे से चिन्तित होकर यह सोचकर कि राजपूत किसी का पल्ला नहीं पकड़ते, आदेश दिया कि जितने हिन्दू राजा गुरू जी की पल्ला पकड़कर बाहर आ जाऐं, उन्हें कारावास से मुक्त कर दिया जाऐगा।

इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए गुरू जी ने ५२ कलियों वाला एक ऐसा चौला सिलवाया, जिसको पकड़कर ५२ हिन्दू राजा बन्दी छोड़ का जयघोष करते हुए किले से रिहा हुए। वर्तमान में यह चौला गुरू घुड़ाणी कलाँ पायल जिला ‌लुधियाना में सुशोभित है। दाता बन्दी छोड़ शब्द सबसे पहले ग्वालियर किले के दरोगा हरिदास द्वारा उपयोग किये गए थे। गुरू जी यहाँ पर २ वर्ष और ३ माह तक नजरबन्द रहे।