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3. दैनिक जीवन 

श्री गुरू हरिराय जी ने पूर्व गुरूजनों की भान्ति ही अपना जीवन सँयमी रखा। आपका दैनिक कार्यक्रम भी अपने पूर्व गुरूजनों की भान्ति नियमबद्ध था सात्विक ही था। आपने भी अपना जीवन परहित के लिए समर्पित कर दिया और सर्वदा प्रभु के गुणगान में मग्न रहते और उसकी लीला में सन्तुष्ट रहने की प्रेरणा करते। श्री गुरू हरिराय जी प्रातःकाल, अमृत बेला में बिस्तर त्याग देते। फिर शौच स्नान से निवृत्त होकर एकान्त में बैठकर प्रभु स्मरण में लीन हो जाते। सूर्य उदय होते ही उनका दीवान सज जाता। वहाँ संगत और हरि कीर्तन में जुड़ जाते तद्पश्चात आप अपने प्रवचनों से प्रतिदिन संगत का मार्गदर्शन करते और जिज्ञासुओं की समस्याओं अथवा शँकाओं का समाधान करते। उपरान्त नाश्ते के समय संगत के साथ पँक्तियों में बैठकर लंगर से भोजन ग्रहण करते। अपने दादा गुरू हरिगोबिन्द जी के आदेश अनुसार 2200 (बाईस सौ) जवानों का सैन्यबल रखा हुआ था। जो कि भक्ति के साथ शक्ति के सँगम का प्रतीक था, जिसका आपके दादा जी ने सूत्रपात किया था। सतसँग से अवकाश मिलते ही आप अपने सैनिकों का निरीक्षण करने चले जाते, वहाँ सभी प्रकार की सैन्य गतिविधियों पर विचारविमर्श होता।

आप दोपहर का भोजन अपने परिवार के सदस्यों के साथ करते। इसके उपरान्त कुछ देर के लिए विश्राम करते तद्पश्चात् आप अपनी सैनिक वेश-भूषा धारण करके अपने अँगरक्षकों के सँग शिकार पर निकल जाते। आप इन गतिविधियों को केवल सैनिक प्रशिक्षण के रूप में ही लेते। इन अभियानों से किसी जीव हत्या का प्रयोजन नहीं होता था। आपका एकमात्र लक्ष्य अपने योद्वाओं का मनोबल बढ़ाना होता था, जिससे सिक्ख जगत् में वीरता के प्रति अनुराग बढ़े। सँध्या के समय दीवान में रहिरास साहिब जी के पाठ के उपरान्त आप स्वयँ संगत को वीरों, योद्वाओं की गाथाएँ सुनाते अथवा ढ़ाढ़ी कवियों द्वारा वीरता के प्रसँग सुनवाने का प्रबन्ध करते। आप सिक्खों को समय के अनुकूल ढ़ालना चाहते थे, वैसे तो आप बहुत शान्त स्वभाव के थे, लड़ाई झगड़ों से अरूचि थी किन्तु आपको इतिहास की पूर्व घटनाओं के कड़वे अनुभव, सतर्क रहने के लिए विवश करते थे। यह तथ्य सत्य भी थे। शक्ति सन्तुलन ही शान्ति का कारण बनती है, इसलिए आप हर कीमत पर उसे बनाए रखने में विश्वास रखते थे। आपके जीवनकाल में बहुत से राजनैतिक उथल-पुथल हुए, जिसके परिणामस्वरूप आप पर तीन बार विशाल सैनिक आक्रमण हुए, किन्तु प्रभु कृपा से आप तक सैन्य बल पहुँच ही नहीं पाया। इन घटनाओं की विस्तार से आगामी अध्यायों में चर्चा करेंगे।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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