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16. असहाय वर्ग का मसीहा 

श्री गुरू हरिराय जी गुरमति का प्रचार करने अपने आसपास के क्षेत्रों का दौरा करने निकले। उन दिनों बस्तियाँ कम और जँगल अधिक होते थे। आप जी पँजाब के मालवा क्षेत्रों में से गुजर रहे थे, तभी वहाँ के स्थानीय जम़ीदार लोग आपके पास आये और विनती करने लगे। हमें अपना सिक्ख यानि शिष्य बना ले। गुरूदेव जी ने उनके हृदय को टटोला। उनसे लम्बा विचारविर्मश किया। अंत में कहा– सिक्खी कमानी कठीन है, इसमें आत्मसम्पर्ण चाहिए। केवल बातों से सिक्खी नहीं मिलती ! करनी-कथनी में समानता का नाम है सिक्खी ! यह कार्य आप लोंगो से नहीं होगा क्योकि आप सभी में माया का बड़प्पन है कि हम बहुत बडे भुमिपति है इत्यादि। इस प्रकार गुरूदेव ने कौड़ियाँ जाति के लोगों को सिक्खी के योग्य नही माना और अपनी दृष्टि से रद्द कर दिया। उन्हीं दिनों स्थानीय मराझ जाति के लोग, जो कि कबीलों के रूप में स्थान-स्थान पर विचरण करते रहते थे। गुरूदेव की शरण में आये और उन्होंने गुरूदेव के प्रति बहुत श्रद्धा व्यक्त की। उनका व्यवहार बहुत ही शालीनता पूर्ण था गुरूदेव प्रसन्न हुए। उन्हें सिक्खी बख्शी। उनमें से एक मराझ ने गुरूदेव जी को अपने कष्टों का वृत्तान्त सुनाया।

उसने कहा: हम "भूमिहीन" है। इसलिए स्थान स्थान पर भटकतें फिरते है। इन दिनों आपके निकट हमने भी डेरा डाला हुआ है, किन्तु हमें यह उच्च जातिये अपने कुँओ से पानी नहीं भरने देते। यदि कोई हमारी महिला वहाँ से पानी ले भी आती है तो कौड़िया जाति के युवक हमारी महिलाओं की खिल्ली उड़ाते हैं और उनसे अभद्र व्यवहार करते है। अभी कल की बात है। हमारें यहाँ की नवीनवेली दुलहन को उन्होंने व्यँग करके अपमानित किया है। गुरूदेव जी ने इस घटना को बहुत गम्भीर रूप में लिया। उन्होंने स्थानीय पँचायत को बुला लिया और उनसे इस घटना का उत्तर माँगा ? पँचायत ने न्याय की बात तो क्या करनी थी। उल्टा दोष लगाने लगे, यह लोग हमारी भूमि पर अवैध रूप में रहते हैं और हमें ही आँखें दिखातें हैं। इस पर गुरूदेव जी ने पँचायत से आग्रह किया। आप इन लोगों को स्थाई रूप में बसने के लिए कुछ भूमि दे दें। तो यह अपने लिए सभी प्रकार की सुविधाएँ धीरे-धीरे जुटा लेंगे। किन्तु स्थानीय चौधरी ने एक नहीं मानी और कहा: हम इन्हें अपने निकट कहीं भी बसने नहीं देगें। गुरूदेव जी ने भी इस हठधर्मी को अपने लिए चुनौती माना। गुरू जी ने मराझ कबीले के सरदार को बुलाकर कहा: आप "चिंता न" करें। आप अपने समस्त युवकों को हमारे सैन्यबल से सैनिक प्रशिक्षण के लिए भेंज दे। हमारे सैन्यबल से शिक्षा प्राप्त करें और सभी अस्त्र-शस्त्रों से लैस हो जाओं। मराझ कबीले ने गुरू आज्ञा प्राप्त होते ही ऐसा ही किया। जब उनका सैनिक प्रशिक्षण समाप्त हुआ।

तब गुरू जी ने उन्हें सुझाव दिया: कि आप लोगों को जितनी गुजर-बसर के लिए भूमि चाहिए। उतनी ही पर कोई उचित स्थान देखकर कब्जा कर लें। गुरूदेव के आदेश के अनुसार मराझ कबीले ने वहाँ से कूच करके एक उपजाऊ भूमि पर कब्जा कर लिया। वहाँ का भूपति जैत पुराणा इस बात पर बहुत क्रोधित हुआ। उसने मराझ कबीले को संदेश भेजा कि वे एक दिन के भीतर यहाँ से कहीं और चले जायें। अन्यथा सभी को मारकाट दिया जायेंगा। उत्तर में मराझ कबीलें के सरदार ने गुरू हरिराय जी का आदेश सुनाया कि उन्होंने हमें यहाँ बसने के लिए भेजा है। किन्तु भूपति जैत पुराणा अभिमान में आ गया और अहँभाव में कहने लगा कौन गुरू जी ? मैं नहीं जानता किसी गुरू को। उसने फिर से समय सीमा निर्धरित कर दी और कहा: कि यदि वह एक दिन के भीतर अपना डेरा यहां से नहीं उठाते तो वह उन्हें बलपूर्वक खदेड़ देगा। इस बात की उन्होंने गुरूदेव को सुचना दी। गुरूदेव जी ने उनको धैर्य से काम लेने को कहा और संदेश भेजा। तुम युद्ध के लिए तैयार रहो। जैसे ही तुम पर आक्रमण हो उसका उत्तर साहस और वीरता से दो। प्रभु पर भरोसा रखो, रणक्षेत्र में अवश्य ही तुम्हारी विजय होगी। गुरूदेव की आशिष प्राप्त करके मराझ कबीले का आत्मविश्वास जागृत हो गया। निर्धारित समय सीमा समाप्त होने पर दोनों पक्षों के योद्धा रणक्षेत्र में उतरे। भूपति जैत पुराणा को कदापि आशा नही थी कि मराझ कबीला उन से लोहा लेने को तत्पर होगा । उसका विचार था, हमारे जवानों को देखते ही वे भाग खड़े होगें और क्षमा याचना करेगें। किन्तु जब कड़ा मुकाबला हुआ तो कुछ ही देरी में जैत पुराणा मारा गया और उसके जवान रणक्षेत्र छोड़कर भाग खडे हुए। इस प्रकार मैदान मराझ कबीले के हाथ लगा। वे गुरूदेव का धन्यवाद करने गुरू चरणों में हाज़िर हुए। इस प्रकार गुरूदेव ने असहाय कबीले को समर्थन देकर आत्म निर्भर बना दिया।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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