44. आगरे नगर की संगत
श्री गुरू अरजन देव साहिब जी के दरबार में एक दिन आगरा नगर से संगत काफिले के रूप
में एकत्र होकर पहुँची उनमें से अधिकाँश भाई गुरदास जी के प्रवचन सुना करते थे
किन्तु लम्बे समय से भाई गुरदास जी आगरा त्यागकर गुरू चरणों में सेवारत थे। संगत के
मुखी ने गुरू जी से अनुरोध किया। पहले भाई गुरदास जी हमारी आध्यात्मिक समस्याओं का
समाधान कर देते थे किन्तु अब लम्बी यात्रा करके आपके पास उपस्थित हुए हैं। कृप्या
हमारी जिज्ञासाएँ शाँत करें। इस पर गुरू जी ने उनको साँत्वना दी और कहा कि यदि प्रभु
ने चाहा तो आप सन्तुष्ट होकर ही लोटेंगे, आप निश्चिंत रहें ! तभी उन अभ्यागतों ने
कहना प्रारम्भ किया कि हमारे समाज में अनेकों धारणाएँ प्रचलित हैं। कोई कहता है,
ग्रन्थ पढ़ो, कोई कहता है, गृहस्थ त्यागकर वनों में तप करो। कोई कहता है तीर्थों का
भ्रमण करो, कोई मूर्ति पूजा में विश्वास करता है तो कोई कर्मकाण्डों में विश्वास
करता है तथा कोई निराकार प्रभु में विश्वास रखता है। कृप्या आप ही बताएँ हमें कौनसा
मार्ग अपनाना चाहिए जिससे हमें प्रभु की निकटता प्राप्त हो सके ? गुरू जी ने उत्तर
में कहा कि प्रभु का संबंध मन से है शरीर से नहीं, शरीर तो नाशवान है अतः
आध्यात्मिक दुनियाँ में इसका महत्व गौण है। हम जो भी धार्मिक कार्य करें उसमें
मन-चित सम्मिलित होना अति आवश्यक है। अतः हमें उस निराकार प्रभु यानि रोम में बसे
राम को सुरति सुमिरन से ही अराधना चाहिए। इसके लिए किसी कर्मकाण्ड या आडम्बर रचने
की कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि प्रभु अन्तःकरण की शुद्धता पर खुश होता है, शरीर की
वेशभूषा पर नहीं। इस बात को दूसरे शब्दों में समझाने के लिए हम आपको इस प्रकार कह
सकते हैं जैसे आपकी पत्नी, आपकी अर्धांगनी कहलाती है। ठीक इसी प्रकार आप अपनी आत्मा
का विवाह शुभ गुणों से करें। जो आपके साथ परलोक में भी सहायक बने, जैसे नम्रता,
धैर्य, दया तथा अद्वैतवाद इत्यादि। यदि शुभ गुण आपकी आत्मा की अर्धांगनी रूप में
सहीयोगी बन जाएँगे तो सहज ही प्रभु की निकटता प्राप्त हो जाएगी।