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19. भाई त्रिलोका जी

श्री गुरू अरजन देव साहिब जी के दरबार में अफगानिस्तान के गजनी क्षेत्र से संगत गुरू दर्शनों को आई। श्री अमृतसर साहिब जी पहुँचने पर गुरू जी की ओर से उनका भव्य स्वागत किया गया। संगत में से एक त्रिलोका नामक व्यक्ति ने गुरू जी के समक्ष निवेदन किया कि हे गुरूदेव ! मुझे प्रभु दर्शनों की तीव्र अभिलाषा है। कृपया मुझे युक्ति प्रदान करें, जिससे मैं उस स्वामी के दर्शन कर सकूँ। गुरू जी ने त्रिलोका की अभिलाषा पर प्रसन्न हो उठे और उपदेश दिया कि समस्त प्राणीमात्र उस प्रभु की रचना है। वह स्वयँ अपनी रचना में विराजमान है अर्थात समस्त जीव उसी के अँश हैं, वही सभी का पिता है, इसलिए सभी पर दया करनी चाहिए। इस प्रकार उस प्रभु को प्रसन्न करने में सफल हो सकते हैं और वह हमें अपनी रचना में दिखाई देने लग जाएँगे। भाई त्रिलोका जी ने गुरू जी को प्रवचनों को समझा और उन पर आचरण करने का मन बनाकर वापिस गजनी आ गया। उनकी नियुक्ति सेना में थी। उनका अधिकारी सैनिकों को प्रशिक्षण देने के लिए समय-समय पर कवायत करवाता रहता था, जिसके अनुसार कुछ दिनों के पश्चात जँगल में शिकार खेलने जाना होता था। अधिकारियों का मानना था कि शिकार एक अच्छा सैनिक प्रशिक्षण है। एक दिन सैनिक अधिकारियों के साथ भाई त्रिलोका जी को शिकार पर जाना पड़ा, अकस्मात एक हिरनी त्रिलोका जी के सामने पड़ गई। उन्होंने हिरनी के पीछे घोड़ा भगाया और इस हिरनी को तलवार से दो भागों में काट दिया। हिरनी गर्भवती थी। अतः उसके बच्चे भाई त्रिलोका जी के समक्ष मर गए। इस दुघटना का भाई जी के कोमल दिल पर गहरा आघात हुआ। वह प्रायश्चित करने लगे किन्तु अब क्या हो सकता था ? उन्होंने स्वचिंतन प्रारम्भ किया और पाया कि यदि मेरे पास घातक शस्त्र ने होता तो यह हत्या सम्भव ही नहीं होनी थी। अतः उन्होंने इस्पात (फौलाद) की तलवार के स्थान पर लकड़ी की तलवार बनाकर धारण कर ली। समय व्यतीत होने लगा। एक दिन सैनिक अधिकारी ने अकस्मात सभी जवानों के शस्त्र निरीक्षण किए। उसने आदेश दिया कि सभी जवान एक कतार में खड़े हो जाएँ और अपने शस्त्रों का मुआयना करवाएँ। भाई त्रिलोका जी यह हुक्म सुनते ही सकते में आ गए। उनको अहसास हुआ कि उनसे भूल हुई है, यदि काठ की तलवार उसके अधिकारी ने देख ली तो नौकरी तो गई, इसके साथ दण्ड रूप में गद्दारी का आरोप भी लगाया जा सकता है। ऐसे में उनका ध्यान गुरू चरणों में गया। वह मन की मन प्रार्थना करने लगे कि हे गुरूदेव ! मैं विपत्तिकाल में हूँ। मुझे आपके अतिरिक्त कहीं और से सहायता सम्भव नहीं है। अतः मेरी लाज रखें और मुझे इस सँकटकाल से उभार लें। दूसरी ओर श्री अमृतसर साहिब जी में श्री गुरू अरजन देव साहिब जी दरबार साहिब में विराजमान थे कि अकस्मात उन्होंने एक सेवक को आदेश दिया कि तोशे खाने से एक तलवार लेकर आओ। सेवक तुरन्त तलवार लेकर हाजिर हुआ। गुरू जी ने वह म्यान में से बाहर निकाली और उसे घुमा फिराकर संगत को दिखाने लगे जैसे कि शस्त्रों की तेज धार का निरीक्षण किया जा रहा हो। कुछ क्षणों बाद उसे फिर से म्यान में रखकर तौशेखाने में वापिस भेज दिया। संगत को इस प्रकार गुरू जी द्वारा तलवार दिखाना अदभुत लगा। एक सेवक ने जिज्ञासा व्यक्त की और गुरू जी से प्रश्न पूछ ही लिया। आज आप तलवार से क्यों खेल रहे हैं। उत्तर में गुरू जी ने कहा कि समय आएगा तो आप स्वयँ ही इस भेद को भी जान जाएँगे।

भाई त्रिलोका जी प्रार्थना में खो गए। सभी जवान बारी-बारी से अपनी तलवारों का मुआयना करवा रहे थे। आखिर त्रिलोका जी की बारी भी आ गई। उन्होंने गुरू जी का दिल में नाम लिया और उन्हें समर्थ जानकर म्यान से तलवार निकालकर अधिकारी को दिखाई। तलवार की चमक अधिकारी की आखों में पड़ी और वह चौंक गया इसलिए उसने इस तलवार को दो तीन बार पलटकर देखा और आश्चर्य में पड़ गया और उसके मुख से निकला ईल्लाही-शमशीर अर्थात अदभुत तलवार तभी उसने भाई त्रिलोका जी को पृस्कृत करने की घोषणा कर दी। भाई जी इस चमत्कार के लिए गुरू जी के लिए कृतज्ञता में अवाक खड़े रहे और उनके नेत्रों से प्रेम से आँसू बह निकले। कुछ दिनों पश्चात वह छुटटी लेकर गुरू जी के दरबार में श्री अमृतसर साहिब जी हाजिर हुए और उन्होंने बताया कि मैं सँकटकाल में प्रार्थना कर रहा था कि हे गुरूदेव जी ! जैसे दूर्योधन के दरबार में द्रोपदी की, चीरहरण के समय लाज रखी थी, ठीक इसी प्रकार आप मेरी सहायता में पहुँचें।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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