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44. शेख उबारे खान

श्री गुरू नानक देव जी के दरबार से सिक्खी धारण करके जब शेख मालो जी अपने गृह लौट गए तो उनके मित्र शेख उबारे खान को भी जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि जिस महापुरुष की प्रशँसा उसका मित्र कर रहा है उनके दर्शन किये जाएँ। अतः वह भी समय पाकर गुरू दरबार में उपस्थित हुए। अभिवादन के पश्चात् शेख ने आप से विनती की: हे "पीर जी" ! कृपया आप यह बताएँ कि आध्यात्मिक ज्ञान में हिन्दू दर्शन शास्त्र सम्पूर्ण है या फिर मुसलमानी फलसफा ? गुरुदेव ने इस प्रश्न के उत्तर में कहा: दोनो में तत्व सार, "आचरण" अनिवार्य अंग है। मानवता का उद्देश्य भी यही है। यदि कोई सम्प्रदाय यह दावा करे कि उनकी पद्धति ही श्रेष्ठ अथवा सर्वोत्तम है जिससे प्रभु प्राप्ति सम्भव है तो यह मिथ्या प्रचार है क्योंकि प्रभु तो विधि विधानों से प्रसन्न नहीं होता, वह तो भक्त की भावना पर न्योछावर होता है। उबारे खान कट्टरता के धरातल से चेतना एवँ जागृति पर लौट आये। जिससे वह बहुत प्रसन्न चित होकर अपने निज स्वरूप की खोज में लग गये।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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