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39. पृथा और खेड़ा

श्री गुरू नानक देव जी के दरबार में दर्शनार्थ दो मित्र पृथा और खेड़ा भी करतारपुर आये। उन्होंने नित्य के कार्यक्रम में कीर्तन तथा गुरुदेव के प्रवचन सुने तो उन्हें ज्ञान हो गया कि साँसारिक वस्तुएँ मिथ्या हैं किन्तु घर से चलते समय मन में कुछ कामनाएँ लेकर चले थे जो कि सतसँग करने पर निवृत हो गईं। कुछ दिन वे दोनों गुरू दरबार की सेवा में व्यस्त रहे। एक दिन जब अचानक वे गुरुदेव के सम्मुख हुए तो उन्होंने आग्रह किया, कुछ माँगो। आपकी सेवा-भक्ति पर हम सन्तुष्ट हैं। किन्तु उस समय तक दोनों की अन्तर आत्मा तृप्त हो जाने के कारण कुछ माँग नहीं पा रहे थे। गुरुदेव के वचन सुनकर प्रेम के वशीभूत होकर उनके नेत्र द्रवित हो उठे और बस इतना ही कह पाए, हे दीन बन्धु ! आप तो सर्वज्ञ हैं अतः ऐसी वस्तु दें जिससे मन शाँत हो जाए तथा सभी कामनाएँ सदैव के लिए समाप्त हो जाएँ, जिससे फिर कभी याचना करने की इच्छा ही न रहे। इस उत्तर को सुनकर गुरुदेव अत्यन्त प्रसन्न हुए, परन्तु उन्होंने पुनः वचन किया, आप जब घर से यहाँ आए थे तो मन में कामना लेकर चले थे। अब समय है माँगो ! किन्तु अब दोनों मित्र निष्काम हो चुके थे। अतः उन्होंने निवेदन किया, गुरुदेव जी ! अब तो बस यही याचना है कि हमें अपने चरणों में स्थान दे दें, जिससे आवागमन का चक्कर समाप्त हो जाए। गुरुदेव ने गुरमति के अनुकूल प्रार्थना सुनकर खुशी महसूस की और कृपा दृष्टि से कहने लगे, यदि आप इसी प्रकार सत पुरुषों की सेवा में तत्पर रहा करेंगे तो हमारी चरण-शरण में सदैव रहोगे, क्योंकि गुरुसिक्खों की सँगति ही परमेश्वर में अभेद होने का एक मात्र मार्ग है। शरीर सर्गुण स्वरूप है जिससे कभी न कभी "वियोग" अवश्य ही होगा परन्तु यदि "निर्गुण" स्वरूप "शब्द" को हृदय में बसाओगे तो फिर कभी भी बिछुड़ोगे नहीं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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