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36. भाई जोध जी तथा फिरणा जी

श्री गुरू नानक देव जी के दरबार में दूर-दूर से जिज्ञासु आते और अपनी मानसिक अवस्था प्रकट करते। गुरुदेव उन्हें उन्हीं के अनुरूप शिक्षा देकर कृतार्थ करते। एक दिन गुरुदेव के समक्ष भाई जोध जी तथा भाई फिरणा जी आए और प्रार्थना करने लगे, हे गुरुदेव जी ! हमें सफल जीवन की युक्ति बताएँ। गुरुदेव ने उनके दृढ़ सँकल्प को देखते हुए, उनकी भावनाओं के अनुरूप एक विशेष आदेश दिया:, 1. "अमृत बेला" का "समय" कभी भी बिस्तर पर नष्ट नहीं करना, सूर्योदय से दो घड़ी पहले सदैव शौच-स्नान से निवृत होकर प्रभु चिंतन के लिए मन एकाग्र करके गुरु शब्द में ध्यान लगाना अथवा बाणी पठन का अभ्यास करना। 2. "सत्संगत" में जाकर सेवा करने का अभ्यास करना, जिससे अहँ भाव से छुटकारा प्राप्त होगा। 3. "बालों का मुण्डन", "रोमों का खण्डन नहीं" करना, "केशों" का सत्कार करना। इससे आपको निज स्वरूप प्राप्त होगा, जिसमें प्रभु के दर्शन करना सहज हो जाएगा। यही युक्ति सफलता की कुँजी है। भाई जोध जी ने इस पर पूछा गुरुदेव जी, चिंतन-मनन प्रातःकाल ही क्यों करना चाहिए ? गुरुदेव ने उत्तर में कहा, प्रारम्भिक अवस्था में अभ्यासी के लिए यह समय उपयुक्त है क्योंकि उस समय शरीर और मन अभयास के लिए तैयार रहते हैं, जिससे प्राप्तियाँ सहज में सम्भव हो जाती हैं। उन दोनों ने गुरू उपदेश की कमाई करने का प्रयत्न किया और गुरुदेव के सफल अनन्य सिक्ख कहलाए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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