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27. बुड़ा नामक किशोर (कत्थू नँगल ग्राम, पँजाब)

श्री गुरू नानक देव जी तलवण्डी ग्राम से भाई मरदाना जी को साथ लेकर अपने परिवार को मिलने पक्खो के रँधवे के लिए चल पड़े। रास्ते में एक पड़ाव के समय जब आप कत्थू नँगल ग्राम मे एक वृक्ष के नीचे कीर्तन में व्यस्त थे, तो एक किशोर अवस्था का बालक आपकी मधुर बाणी के आकर्षण से चला आया और काफी समय कीर्तन श्रवण करता रहा, फिर जल्दी से घर लौट गया। घर से कुछ खाद्य पदार्थ तथा दूध लाकर गुरुदेव को भेंट करते हुए कहा, आप, कृपया इनका सेवन करें। उस किशोर की सेवा-भक्ति देखकर गुरुदेव अति प्रसन्न हुए और आशीष देते हुए कहा, चिरँजीव रहो ! तथा पूछा: बेटा तुम क्या चाहते हो ? किशोर ने उत्तर दिया: हे गुरुदेव जी ! मुझे मृत्यु से बहुत भय लगता है, मैं इस भय से मुक्त होना चाहता हूँ। इस पर गुरुदेव ने कहा: बेटा तेरी आयु तो खेलने-कूदने की है तुझे यह गम्भीर बातें कहाँ से सूझी हैं ? यह मृत्यु का भय इत्यादि तो बुढ़ापे की कल्पना होती है। वैसे मृत्यु ने आना तो एक न एक दिन अवश्य ही है। यह उत्तर सुनकर किशोर ने फिर कहा: कि यही तो मैं कह रहा हूँ, मृत्यु का क्या भरोसा न जाने कब आ जाए। इसलिए मैं उससे भयभीत रहता हूँ। उसकी यह बात सुनकर गुरुदेव कहने लगे: बेटा तुमने तो बहुत तीक्ष्ण बुद्धि पाई है। उन सूक्ष्म बातों पर बड़े-बड़े लोग भी अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते, यदि मृत्यु का भय ही प्रत्येक व्यक्ति अपने सामने रखे तो यह अपराध ही क्यों हो ? खैर, तुम्हारा नाम क्या है ? किशोर ने उत्तर में बताया: उसका नाम बूढ़ा है तथा उसका घर इसी गाँव में है। गुरुदेव ने तब कहा: तेरे माता पिता ने तेरा नाम उचित ही रखा है क्योंकि तू तो अल्प आयु में ही बहुत सूझ-बूझ की बूढ़ों जैसी बातें करता है, वैसे यह मृत्यु का भय तुम्हें कब से सताने लगा है ? किशोर, बुढ़ा जी ने कहा: कि एक दिन मेरी माता ने मुझे आग जलाने के लिए कहा मैंने बहुत प्रयत्न किया परन्तु आग नहीं जली। इस पर माता जी ने मुझे बताया कि आग जलाने के लिए पहले छोटी लकड़ियाँ तथा तिनके घास इत्यादि जलाए जाते हैं। तब कहीं बड़ी लकड़ियाँ जलती हैं। बस मैं उसी दिन से इस विचार में हूँ कि जिस प्रकार आग पहले छोटी लकड़ियों को जलाती है ठीक इस प्रकार यदि मृत्यु भी पहले छोटे बच्चों या किशोरों को ले जाए तो क्या होगा ? गुरुदेव ने कहा: बेटा ! तुम भाग्यवान हो जो तुम्हें मृत्यु निकट दिखाई देती है। इसी पैनी दृष्टि के कारण एक दिन तुम बहुत महान बनोगे। यदि तुम चाहो तो हमारे आश्रम में आकर रहो। यह सुनकर बूढ़ा ने प्रसन्न होकर पूछा: हे गुरुदेव जी ! आपका आश्रम कहाँ है ? गुरुदेव ने उसे बताया: उनका आश्रम वहाँ से लगभग 30 कोस की दूरी पर रावी नदी के तट पर निमार्णाधीन है। उन्होंने उसका नाम करतारपुर रखने का निश्चय किया है। अब वे लौटकर उसमें स्थायी रूप से रहने लगेगें तथा वहीं से गुरुमत का प्रचार करेंगे। इस सब जानकारी को प्राप्त करके किशोर, बूढ़ा जी कहने लगा: कि गुरुदेव ! मैं अपने माता-पिता से आज्ञा लेकर कुछ दिन बाद आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा। गुरुदेव ने तब किशोर से कहा: यदि हमारे पास आना हो तो पहले उसके लिए दृढ़ निश्चय तथा आत्मसमर्पण की भावना पक्की कर लेना और उसके लिए स्वयँ को तैयार करो:

जउ तउ प्रेम खेलन का चाउ ।। सिरु धर तली गली मेरी आउ ।।
इतु मारगि पैरु धरीजै ।। सिरु दीजै काणि न कीजै ।। मः 1, अंग 1412

अर्थः हे भाई ! अगर तूझे प्रभू प्रेम का खेल खेलने का शौक है तो अपना सिर तली के ऊपर रखकर मेरी गली में आ, लोक लाज छोड़कर और अहँकार दूर करके आ। प्रभू प्रीत के इस रास्ते पर उसी समय पैर रखा जा सकता है, जब सिर भेंट में दिया जाए और किसी प्रकार की कोई झिझक ना की जाए। जब झिझक, लोक लाज और अहँकार को छोड़ा जाए। 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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