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2. निराकार उपासना ही फलीभूत होती है (काँगड़ा नगर, हिमाचल प्रदेश)

श्री गुरू नानक देव जी चम्बा नगर से काँगड़ा प्रस्थान कर गए। पौराणिक कथा अनुसार पार्वती के सती होने पर शिवजी द्वारा उसके शव को लेकर जगह जगह घूमने से जिस धरती पर कान गिरा, तो यह क्षेत्र काँगड़ा कहलाया। यहाँ पर एक बहुत प्रसिद्ध मन्दिर है जहां पर देवी की पूजा होती है। अपने भक्तों की मण्डली के साथ गुरुदेव जब काँगड़ा पहुँचे तो उनकी निराकार उपासना की प्रसिद्धि सुनकर, दूर-दूर से जिज्ञासु उनके दर्शनों को आने लगे। किन्तु पुजारीगण, गुरुदेव से ईर्ष्या करने लगे। उनका मत था कि बिना प्रत्यक्ष दर्शन किये निराकार प्रभु की आराधना कोई किस प्रकार कर सकता है ? व्यक्ति को भगवान की छवि तो दिखाई देनी ही चाहिए। अतः वे इकट्ठे होकर गुरुदेव के साथ उलझने के लिए पहुँच गए। गुरुदेव उस समय संगत के समक्ष कीर्तन करते हुए उच्चारण कर रहे थे:

एका मूरति साचा नाउ।। तिथै निबड़ै साचु निआउ ।।
साची करणी पति परवाणु ।। साची दरगाह पावै माणु ।।
राग बसंत, अंग 1188

अर्थः उसका नाम सच्चा है, जो कि केवल एक ही हस्ती है और वह है, परमात्मा। परमात्मा के दरबार में सच्चा न्याय होता है यानि सही इन्साफ होता है। जो इन्सान सच की कमाई करते हैं, वो इज्जत पाते हैं, मान पाते हैं और कबूल हो जाते हैं और परमात्मा के दरबार में उसके दर पर प्रभुता पाते है उसका आर्शीवाद पाते हैं। पुजारी वर्ग को आवेश में आते देखकर गुरुदेव ने सब माजरा समझ लिया कि उन लोगों की रोटी-रोजी को सच्चाई से आघात पहुँच रहा है अतः उन्होंने युक्ति से कड़वे सत्य को घर-घर पहुँचाने के लिए कार्यक्रम बनाया तथा अपने प्रवचनों में कहना प्रारम्भ किया:

तेरी मूरति एका बहुतु रूप ।। किसु पूज चड़ावउ देउ धूप ।।
तेरा अंतु न पाइआ कहा पाइ ।। तेरा दासनि दासा कहउ राइ ।।
राग बसंत, अंग 1168

हे प्रभु, तू अनंत रूप है, मैं किसे पुजूँ तथा किसे धूप दूँ। मैं अल्पज्ञ, समझ नहीं पा रहा हूँ। क्योंकि तू बेअन्त है। अतः तेरा नाम ही मेरे लिए मूर्ति है। जहां पर मुझे सच्चा न्याय मिलने की आशा है। इसलिए, हे ! मेरे स्वामी मैं जानता हूँ कि मेरे सत्य कार्य तुझे स्वीकार्य है। मुझे वही कार्य तेरे दरबार में सम्मान दिलवा सकते हैं। अन्यथा नहीं, क्योंकि मैं जानता हूँ धर्म ग्रँथों में स्पष्ट लिखा है। पाखण्ड करने से आप पाखण्डी के निकट भी नहीं आते।

सिम्रिति सासत्र करहि वखिआण ।। नादी बेदी पढ़हि पूराण ।।
पाखण्ड द्रिसटि मनि कपटु कमाहि ।। तिन कै रमईआ नेड़ि नाहि ।।
राग बसंत, अंग 1169

यह सुनकर पुजारी वर्ग उलझने का साहस नहीं कर पाया क्योंकि वे जानते थे कि उनके कार्यों में पाखण्ड ही पाखण्ड छिपा हुआ है, अतः वे शान्त होकर चुपके से वापस खिसक गए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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