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10. भूमि पँचायत को मिली (नालागढ़, हिमाचल)

श्री गुरू नानक देव जी कीरतपुर क्षेत्र से नालागढ पहुँचे। पर्वतीय क्षेत्र की तलहटी में बसा नालागढ़ एक रमणीक स्थान है। उसका सौन्दर्य देखते ही बनता है। गुरुदेव ने एक वृक्ष के नीचे अपना आसन लगाया और कीर्तन में लीन हो गए। जैसे ही राहगीरों ने गुरुदेव की मधुर बाणी सुनी, वे एक-एक करके, धीरे-धीरे गुरुदेव के पास आ बैठे और बाणी श्रवण करने लगे। गुरुदेव उच्चारण कर रहे थे: 

माइआ सचि राजे अंहकारी ।।
माइआ साथ न चलै पिआरी ।।
माइआ ममता है बहु रंगी ।।
बिन नावै को साथि न संगी ।।
जिउ मनु देखहि पर मनु तैसा ।।
जैसी मनसा तैसी दसा ।।
जैसा करमु तैसी लिव लावै ।।
सतिगुरु पूछि सहज घरु पावै ।। राग प्रभाती, अंग 1342

अर्थः धन एकत्रित करने के कारण राजा आदि अहँकारी हो जाते हैं। परन्तु यह मीठी धन दौलत प्राणी के साथ नहीं जाती। माया की ममता की कई किस्में हैं। परमात्मा के नाम के बगैर इन्सान का कोई मित्र और साथी नहीं। जिस प्रकार का अपना मन होता है, उसी तरह से वह औरों को देखता है। जैसी इन्सान की ख्वाहिश होती है, वैसी ही उसके मन की दशा हो जाती है। जिस प्रकार के जीव के कर्म होते है उसी प्रकार की उसकी लिव लगती है। सच्चे गुरू की शिक्षा द्वारा इन्सान शान्ति के धाम को पा लेता है। कीर्तन की समाप्ति पर गाँव का प्रधान वहाँ पर आ गया। उसने भी गुरुदेव के प्रवचन सुने। और विचार करने लगा कि गुरुदेव की शिक्षा पर यदि वे अपना व्यवहार बना लें तो उनकी सब सामाजिक बुराइयाँ समाप्त हो जायेंगी। अतः उसने गुरुदेव से आग्रह किया कि गुरुदेव जी उनके गाँव में चलें, ताकि वे उनकी अन्न-जल से सेवा कर सकें। उसके अनुरोध पर गुरुदेव जी उसी के यहाँ ठहरे। दूसरे दिन गाँव के मुखिया होने के नाते उसके यहाँ पँचायत द्वारा दो पड़ौसी किसानों की जमीन का एक झगड़ा निपटाया जाना था। पँचायत ने दोनों किसानों के तर्क सुने। परन्तु कैसे निर्णय करें, इसमें असमर्थता अनुभव की, क्योंकि दोनों किसानों की बात में कुछ तथ्य युक्तिसंगत थे। अतः उन्होंने निर्णय के लिए गुरुदेव की सहायता माँगी। इस पर गुरुदेव कहने लगे: 

हकु पराइया नानका उसु सूअर उसु गाइ ।।
गुरु पीरु हामा ता भरे जा मुरदारु न खाइ ।। राग माझ, अंग 141

अर्थः हे नानक ! पराया हक मुस्लमान के लिए सूअर है और हिन्दू के लिए गाय है। गुरू और पैगम्बर तभी सिफारिश करते हैं अगर मनुष्य ने पराया हक ना खाया हो। केवल बातें करने से ही स्वर्ग या बहिशत में नहीं जाया जा सकता। इस उपदेश को सुनते ही दोनों किसानों ने अपना-अपना दावा छोड़ दिया तथा वह भूमि पँचायत को दे दी। पँचायत के मन में विचार आया कि अब उस भूमि के टुकड़े का क्या किया जाए। गुरुदेव ने तब परामर्श दिया कि वहाँ पर एक धर्मशाला बनवाई जाए। यह विचार सबके मन को भा गया। इस प्रकार वहाँ पर तुरन्त धर्मशाला बनवाकर सतसँग की स्थापना की गई और वहाँ पर हरि-यश होने लगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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