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9. नाथद्वार, पण्डों का ऐश्वर्य (उदयपुर, राजस्थान)

श्री गुरू नानक देव जी चितौड़गढ़ से प्रस्थान करके उदयपुर पहुँचे। यहाँ श्री कृष्ण जी का मन्दिर ‘नाथ द्वार’ नाम से प्रसिद्ध है। जनसाधारण अपार श्रद्धा के कारण धन सम्पदा भेंट करने में किसी से पीछे रहना नहीं चाहते। अतः वहाँ के पुजारी बहुत धनी थे। धन की अधिकता के कारण सभी पण्डे अभिमानी तथा ऐश्वर्य का जीवन जीने में ही व्यस्त रहते थे। पुजारियों ने जब गुरुदेव को देखा तो उन्होंने सोचा यह कोई साधारण साधु है, कोई सेठ-व्यापारी तो है नहीं, जिनसे कुछ धन मिलने की सम्भावना हो। अंतः उन्होंने गुरुदेव को मन्दिर के निकट नहीं आने दिया। उल्टे कुछ रूखे शब्दों से सम्बोधन किया। भाई मरदाना जी ने उनको ध्यान से देखा तो महसूस किया कि वह लोग उन्हें तुच्छ जानकर दुर्यवहार कर रहे हैं। उनका रहन-सहन बहुत वैभव पूर्ण था। उन्होंने बहुत कीमती रेशमी वस्त्र धारण किए हुए थे तथा इत्र लगाकर हीरों की मालाएँ पहन रखी थी। इस प्रकार के धन के प्रदर्शन को भाई मरदाना ने धर्म-कर्म के विरुद्ध जाना। तथा, गुरुदेव से प्रश्न किया: हे गुरुदेव जी ! इन पण्डों की बुद्धि धन के नशे में खराब हो गई है। मनुष्य को मनुष्य ही नहीं समझते। जबकि उनका कर्तव्य है अतिथियों का स्वागत करना तथा उनकी सुख सुविधा का प्रबन्ध करना। किन्तु इनकी प्रत्येक बात के पीछे स्वार्थ झलक रहा है। उत्तर में गुरुदेव जी ने भाई मरदाना को कीर्तन प्रारम्भ करने को कहा: और शब्द उच्चारण करने लगे:

चोआ चंदनु अंकि चड़ावउ ।।
पाट पटंबर पहिरि हढावउ बिनु हरिनामु कहा सुखु पावउ ।।
किआ पहिरउ किआ ओड़ि दिखावउ ।।
बिनु जगदीस कहा सुख पावउ ।। रहाउ ।। राग गउड़ी, अंग 225

अर्थ: अगर में अपने शरीर पर इत्र और चन्दन लगाकर रेश्मी वस्त्र धारण कर लूँ और मैं परमात्मा के नाम से दूर हूँ, तो भी मुझे सुख नहीं मिल सकता। बढ़िया-बढ़िया कपड़े पहन कर और धारण करके दूसरों को दिखाने का क्या लाभ है ? परमात्मा के चरणों में जुड़े बिना और कहीं भी सुख नहीं मिल सकता। गुरुदेव का कीर्तन सुनने यात्रियों की भीड़ उमड़ पड़ी। सभी लगे हरियश सुनने। यह देखकर पण्डों को चिन्ता हुई कि यात्री कहीं सभी धन इन्हीं साधुओं को न अर्पित कर दें। इस उद्देश्य से वह इकट्ठे होकर विचार करने लगे कि गुरुदेव को वहाँ से कैसे हटाया जाए ? तभी एक जिज्ञासु ने गुरुदेव से प्रश्न किया: आपकी बाणी अनुसार माया तुच्छ है। इस से सुख प्राप्त नहीं हो सकते, केवल हरिनाम में ही सुख छिपे पड़े हैं। परन्तु यहाँ पर तो चारों ओर माया का ही बोलबाला है। फिर हम किस बात पर विश्वास करें। गुरुदेव ने अपने प्रवचनों में उत्तर दिया: माया का जो भी प्रसार आप देख रहे हैं वह सुहावना तो प्रतीत होता है किन्तु इसके पीछे समाप्त न होने वाला कलेश है। इसलिए इन को भोगते समय हृदय में नाम का वास होना अति आवश्यक है। यदि प्रभु नाम का अँकुश हम से छूट गया तो हाथी रूपी मन लोभ में भटकता फिरेगा, जिसमें दुख ही दुख है। यह उत्तर सुनकर सभी सन्तुष्ट हुए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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