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34. स्वाँगी साधु, सँन्यासीयों को ललकार (त्रिवेन्द्रम, केरला)

श्री गुरू नानक देव जी कोचीन बन्दरगाह से आगे बढ़ते हुए केरल प्राँत के मुख्य नगर त्रिवेन्द्रम में पहुँचे। यह भू भाग भी प्राकृतिक सौन्द्रर्य से सम्पन्न है। वहाँ पर तापमान भी लगभग सामान्य रहता है तथा वर्षा अधिक होने के कारण हरा-भरा नमी भरपूर मौसम तथा उपजाऊ प्रदेश है। इसलिए वहाँ पर उत्तरी भारत से अधिकाँश सँन्यासी, साधु वेष में सामूहिक रूप में तीर्थ यात्रा पर भ्रमण करते हुए पहुँचते थे। उनका विश्राम गृह वहाँ के विशाल मन्दिर हुआ करते थे तथा उदर पूर्ति के लिए वे स्थान-स्थान पर पहुँचकर आहार जुटाने में ही ध्यान केन्द्रित रखते थे। कभी उचित भोजन की व्यवस्था न मिल पाने के कारण असन्तोष में परेशान होकर यहाँ-वहाँ भटकने लगते तथा आपस में भोजन के बटवारे पर झगड़ा भी करते। ऐसी ही एक साधु मण्डली की गुरुदेव जी के साथ रास्ते में भेंट हो गई जो कि तृष्णा का दामन न छोड़कर उसके पीछे मारे-मारे फिर रहे थे। वे सब गुरुदेव जी के साथ हो लिए। गुरुदेव जी जहां भी जाते, वे अपने नियमानुसार समय-समय, गाँव देहातों में जनसाधारण के लिए कीर्तन करते और विचारों के आदान-प्रदान के लिए प्रवचन करते, जिससे कहीं-कहीं भक्तजन सेवा करने की दृष्टि से कुछ जलपान, खाद्य सामग्री या उपहार भेंट करते। इस साधु मण्डली में गुरुदेव सब कुछ बराबर बाँट देते। इस प्रकार उनको गुरुदेव का सहारा एक साधन के रूप में मिल गया। जिधर भी गुरुदेव जाते वे लोग वहीं का रुख कर लेते, क्योंकि वे जानते थे कि गुरुदेव की बहुमुखी प्रतिभा के कारण प्रत्येक स्थान पर, उनकी बहुत आदर मान से भली भान्ति सेवा होती थी। परन्तु गुरुदेव जी, उन सभी में सँन्यासियों के लक्षण न पाकर बहुत क्षुब्ध थे कि उन लोगों ने व्यर्थ का साधु-वेष धारण किया हुआ था वास्तव में वे साधु के वेष में स्वादू थे। क्योंकि उनका मुख्य ध्येय मुफत के माल से मौज मस्ती उड़ाना था। अतः गुरुदेव ने उनको चुनौती दी और कहा:

इकि कंद मूलु चुणि खाहि वण खंडि वासा ।।
इकि भगवा वेसु करि फिरहि जोगी संनिआसा ।।
अंदरि त्रिसना बहुतु छादन भोजन की आसा ।।
बिरथा जनमु गवाहि न गिरही न उदासा ।।
जमकालु सिरहु न उतरै त्रिबिधि मनसा ।।
गुरमती काल न आवै नेड़े जा होवै दासनि दासा ।। राग माझ, अंग 140

अर्थ: तुम लोग न गृहस्थी हो, न उदासी, तुम्हारे अन्दर तृष्णा वैसे की वैसे ही है, भोजन तथा वस्त्रों की चाहत है। तुम लोगों ने मन पर विजय न पाकर केवल बाहरी रूप साधु का धारण करके इस मानव जन्म को व्यर्थ गँवाने का कार्य भर किया हुआ है। यदि तुम में से कोई वनों में निवास करके कन्द-मूल फलों पर जीवन निर्वाह कर रहा है तो भी वह गुरू के ज्ञान बिना एकाग्र मन न होकर संकल्प विकल्प से पीछा नहीं छुड़ा पा रहा। सभी गुरू जी की बात सुनकर बहुत शर्मिन्दा हुए और जीवन का लक्ष्य क्या है, जान गए।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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