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8. राजा विजय प्रकाश (गढ़वाल, उत्तर प्रदेश)

गुरुदेव कर्मकाण्डी वैष्णव साधु समझा को रहे थे तब यह प्रवचन सुनकर सब शान्त भाव से गुरुदेव से आग्रह करने लगे कि वह उन्हें इस विषय में विस्तार से समझाएँ। तब क्या था, गुरुदेव ने समस्त दर्शकों को प्यार से बिठाकर सम्बोधित करते हुए कहा, परमात्मा बाहरी पवित्रा पर नहीं रीझता, बल्कि वह तो उन व्यक्तियों पर रीझता है जो विकारों का त्याग करके ऊँचे तथा निर्मल गुणों को मन में धारण करके अपने आचरण को उज्ज्वल करते हैं। जन्म से कोई नीच या ऊँच नहीं होता, व्यक्ति के कर्म ही उसे नीच या ऊँच बनाते हैं। अतः सदैव प्रभु को प्रत्यक्ष मानकर कार्य करने चाहिए क्योंकि उसकी ज्योति प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में प्रज्वलित है। गुरुदेव ने भाई मरदाना जी को रबाब बजाकर उपरोक्त पंक्ति गाकर सँगत में सुनाने को कहा, उस समय गँगा स्नान के लिए गढ़वाल के राजा विजय प्रकाश हरिद्वार पधारे हुए थे। अतः उन्होंने गुरू नानक देव जी की स्तुति सुनी तो वह दर्शनों को आये। उन्होंने गुरुदेव के सामने अपने मन की कई शंकाएँ रखी एवँ आपसे आपकी जाति भी पूछी। इसके उत्तर में गुरुदेव ने उत्तर दिया, वह प्रभु ही मेरा साहब तथा पिता भी है। इसलिए मेरी कोई विशेष जाति नहीं मैं तो एक साधारण मानव मात्र हूँ।

तूं साहिबु हउं संगी तेरा, प्रणवै नानकु जाति कैसी ।। राग आसा, पृष्ठ. 358

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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