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26. ‘बसते रहो तथा उजड़ जाओ’ (रास्ते में, चाईबासा बिहार)

गुरुदेव जी एक दिन एक गाँव में पहुँचे। वहाँ पर विश्राम तथा जल-पान करने के लिए कुएँ पर गए तो उनके साथ वहाँ के निवासियों ने अभद्र व्यवहार करना शुरू कर दिया और अकारण ही व्यँग कसकर ठिठौलीयां करने लगे। यह उपहास भाई मरदाना जी को बहुत बुरा लगा, किन्तु गुरुदेव शाँतचित, अडोल रहे। वहाँ पर किसी भी व्यक्ति ने गुरुदेव जी का अतिथि सत्कार तक न किया। जब गुरुदेव प्रातः काल वहाँ से आगे बढ़ने लगे तो जाते समय कहा यह गाँव सदैव बसता रहे। अगले पड़ाव पर आप जी एक ऐसे गाँव में पहुँचे। जहाँ के लोगों ने आप को देखते ही पूर्ण सत्कार दिया। रात भर आपके प्रवचन सुने तथा प्रभु स्तुति में कीर्तन भी श्रवण किया। वहाँ गुरुदेव के लिए भोजन इत्यादि की भी व्यवस्था कर दी तथा कुछ दिन वहीं ठहरने का गुरुदेव से अनुरोध करने लगे। भाई मरदाना जी गाँववासियों की सत्यवादिता, सदाचारिता तथा प्रेमभक्ति की भावना से बहुत प्रभावित हुए। सभी गाँववासी गुरुदेव को विदा करने आए। किन्तु जाते समय गुरुदेव ने कहा यह गाँव उजड़ जाए। भाई मरदाना जी के हृदय में शँका उत्पन्न हुई, उन से रहा न गया। उन्होंने कौतूहलवश गुरुदेव से पूछा: कि गुरु जी, आपके पास यह अच्छा न्याय है। जहां अपमान हुआ उन लोगों के लिए आपने वरदान दिया कि बसते रहो किन्तु जिन लोगों ने अतिथि सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं रखी उनको आपने श्राप दे दिया कि यह गाँव उजड़ जाए। इस प्रश्न के उत्तर में गुरुदेव ने कहा: भाई यदि उस पहले वाले गाँव का कोई व्यक्ति उजड़कर किसी दूसरे नगर में जाता तो उसकी कुसंगति से दूसरे लोग भी बिगड़ते। अतः उनका वहीं बसे रहना ही भला था। जहां तक अब इस गाँव की बात है यह भले पुरुषों का गाँव है। यदि यह उजड़कर कहीं ओर बसेंगे तो वहाँ भी अपनी अच्छाइयाँ ही फैलाएंगे, जिससे दूसरों का भी भला ही होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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