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23. पण्डों को उपदेश (गया, बिहार)

श्री गुरू नानक देव जी बनारस से प्रस्थान करके चन्दरोली, रास्ते से होते हुए गया नगर पहुँचे। यहाँ फलगू नदी के तट पर हिन्दू तीर्थ है। उन दिनों वहाँ पर एक कहानी प्रसिद्ध थी कि एक राक्षस ने विष्णु को प्रसन्न करके, उनसे वर माँगा कि जो उसके दर्शन करे, उसे मोक्ष को प्राप्ति हो। इसी मान्यता के आधार पर हिन्दू यात्री वहाँ आकर अपने पितरो की गति करवाने के लक्ष्य को लेकर पण्डों को पिंड, जौं के आटे के लड़डू दान में देते थे। जिसके साथ बहुत सी धनराशि दक्षिणा रूप में भी देने का प्रचलन था। श्री गुरू नानक देव जी जब यहाँ पहुँचे और यह सब देखा तो उन्होंने हिन्दु यात्रियों को समझाया कि यह केवल एक कर्मकाण्ड मात्र है जिससे केवल पण्डों की जीविका चलती है। वास्तव में मृत प्राणी को इससे कोई लाभ होने वाला नहीं। उन दिनों पितृ पक्ष का मेला लगा हुआ था। अतः गुरुदेव ने भाई मरदाना जी को रबाब बजाने को कहा तथा स्वयँ, निम्नलिखित शब्द गायन किया:

दीवा मेरा एकु नामु दुखु विचि पाइआ तेलु ।।
उनि चानणि ओहु सोखिया चूका जम सिउ मेलु ।।
लोका मत को फकड़ि पाई ।।
लख मड़िआ करि एकठे एक रती ले भाहि ।। रहाउ।। राग आसा, अंग 358

अर्थ– एक प्रभु की वाणी ही मेरा दीपक है। उसमें दुःख रूपी तेल जल रहा है। प्रभु नाम-रूपी दीये ने दुःख का नाश कर दिया है। जहां ईश्वर-भक्ति होती है वहाँ यम की भी पहुँच नहीं होती, मेरे मित्रों ! मेरे विश्वास को समझो। जिस प्रकार लकड़ी के बड़े ढेर को आग की एक छोटी सी चिँगारी स्वाह, राख कर देती है उसी प्रकार पापों के ढेर को नाश करने के लिए हरिनाम की एक चिँगारी ही काफी है। परमात्मा ही मेरे श्राद्ध का पिण्ड और पत्तल है एवँ उसी करतार का सत्य नाम ही मेरी मरणोपरान्त की क्रिया है। इस मृत्यु लोक में एवँ परलोक में, वर्तमान में एवँ भविष्य में प्रभु नाम ही मेरा आधार है। हे प्रभु ! आपकी आराधना ही गँगा और बनारस है। आत्म चिन्तन ही काशी में बहने वाली गँगा का पवित्र स्थान है। इस पवित्र स्थान को तभी पाया जा सकता है जब मन भगवान भजन में लीन हो जाये। गुरुदेव के इस उपदेश से पण्डे और अपार जन समूह, बहुत प्रभावित हुए। अतः वहाँ पर संगत के सहयोग से गुरुदेव ने एक धर्मशाला बनवाई। जहाँ नित्य प्रति सतसँग होने लगा तथा जिसमें कर्मकाण्डों का त्याग करके सत्य की खोज की व्याख्या होने लगी। पण्डा-पुजारियों के समूह ने भी गुरुदेव के चरणो में अपने उद्धार के लिए प्रार्थना की। गुरुदेव ने उत्तर दिया आप लोग भविष्य में सदाचारी जीवन व्यतीत करें। इसी में आप लोगों का भी कल्याण होगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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