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14. दीवाली पर्व’ (अयोध्या नगर, उत्तर प्रदेश)

कुछ ही दिनों में गुरू नानक देव जी अपने साथियों सहित यात्रा करते हुए अयोध्या पहुँचे। उन दिनों दिवाली पर्व के आगमन की तैयारियां हो रहीं थी। अतः नगर में बहुत धूम-धाम थी। सब लोग मन्दिरो में उपस्थित होकर पूजा अर्चना में लगे हुए थे। विशेषकर लक्ष्मी पूजा पर अधिक बल दिया जा रहा था। यह देखकर मरदाना जी ने गुरू जी से प्रश्न कियाः यहाँ पर लोग श्री राम चन्द्र जी के स्थान पर लक्ष्मी पूजा को क्यों अधिक महत्व देते है ? जबकि यहाँ इन दिनों केवल श्री राम जी ही की याद में उनके कार्यो को स्मरण करके दुष्ट प्रवृतियों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करते हुए उनकी पूजा करनी चाहिए थी। परन्तु इसके विपरीत यह लोग जुआ तथा मदिरा आदि के कारण स्वयँ राक्षस बुद्धि के कार्यो में संलग्न है ? इस प्रश्न के उत्तर में गुरुदेव ने कहाः भाई ! राम जी के जीवन से लोगों ने सीख ही कब ली है ? यह जो भक्त गण दिखाई दे रहे हैं वास्तव में राम भक्त नहीं, केवल माया लक्ष्मी के भक्त है। किन्तु जो माया के पीछे भागता है उससे लक्ष्मी दूर भागती है। जबकि नारायण के पीछे जाने वाले को स्वयँ नारायण गले लगाने के लिए आगे होकर लेने आते हैं। परन्तु यह रहस्य सभी की समझ में आने वाला नहीं कि जब नारायण ही हमारे हो गये तो लक्ष्मी स्वयँ हमारी हो जाएगी। इस विषय पर वहाँ के भक्त गणों से जब विचार-विमर्श हुआ तो गुरुदेव ने कहा, वास्तव में श्री रामचन्द्र जी की स्मृति में दिवाली मनाने का तात्पर्य यह है कि आप उनके दर्शाऐ मार्ग पर चलें, किन्तु आपने तो उनकी मूर्तियां बनाकर उनके आदर्शो के विपरीत कार्य आरम्भ कर दिये हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने शवरी के जूठे बेरों को सेवन करके, यह दिखाया था कि सभी मनुष्य बराबर सम्मान के अधिकारी है, किसी से भी घृणा नहीं होनी चाहिए। किन्तु आपने आज भी शबरी के वंशज, तथाकथित शूद्रों को अपने मन्दिरों में प्रवेश पाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। यह कैसी राम पूजा है ? वास्तव में यह सब मन माने कार्य हैं। उनकी पूजा नहीं, केवल उनका अपमान करने के बराबर है। श्री रामचन्द्र जी पितृ-भक्त तथा त्यागी थे और दानव प्रवृतियो को समाप्त करने के लिए समस्त जीवन संघर्षरत रहे। तथा उन पर विजय पाकर उन्होंने देव प्रवृतियों को प्रोत्साहित किया। यह व्यँगात्मक उपदेश सुनकर सभी के सिर झुक गये तथा गुरुदेव से प्रार्थना करने लगे कि आप बताऐं कि हमारी कल्याण कैसे सम्भव है? उस समय गुरुदेव जी ने शब्द उच्चारण कियाः

चेरी की सेवा करहि ठाकुरु नहीं दीसै ।।
पोखरु नीरु विरोलीऐ माखनु नही रीसै ।। राग-गउड़ी, पृष्ठ 229

(श्री रामचँद्र जी को परमात्मा ने इसलिए भेजा था कि लोग उनके जीवन से कुछ शिक्षा लें, किन्तु लोग उनके जीवन से शिक्षा न लेकर उन्हीं की मुर्ति बनाकर पूजा करते हैं और परमात्मा को भूल जाते हैं)

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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