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17. व्यापारी मनसुख

एक दिन एक मध्य-वर्गी गरीब व्यक्ति गुरू जी के सम्मुख उपस्थित होकर नम्रता पूर्वक विनती करने लगा कि मेरी बेटी का विवाह निश्चित हुआ है, परन्तु उसके पास बेटी को विदा करने के लिए कुछ भी नहीं। अतः अब मेरी लाज आप के हाथ में है। मैं बहुत दूर से आप की उदारता की चर्चा सुन कर आया हूँ। आशा है आप मुझे निराश नहीं लौटाएँगे। यह सुनकर गुरुजी ने उसे मोदीखाने से हर प्रकार की रसद देकर सहायता कर दी। परन्तु वह कुछ एक ऐसी सामग्री भी चाहता था जो कि लड़की के दहेज में जुटानी थी जो कि किसी बड़े नगर में ही प्राप्त हो सकती थी। अतः गुरुजी ने उसके साथ भाई भगीरथ को लाहौर नगर भेजा। वह दोनों एक बड़े व्यापारी मनसुख के यहाँ पहुँचे। उससे आवश्यकता अनुसार कपड़े गहने खरीद लिये। किन्तु, रात अधिक हो जाने के कारण वहीं मनसुख के यहाँ ठहर गये। सँध्या के समय भाई भगीरथ जी ने गुरू नानक जी के दर्शाए मार्ग के अनुसार बिना कर्म-काण्ड के प्रभु भजन किया तथा गुरू जी की वाणी गाकर आराधना की। यह सब देखकर मनसुख को बहुत आश्चर्य हुआ। तथा वह कोतूहल वश भाई भगीरथ जी से पूछने लगेः आपने जो वाणी पढ़ी है वह किस महापुरुष की है ? बहुत भाव पूर्ण तथा हृदय स्पर्शी है। इसके उत्तर में भगीरथ जी ने बतायाः कि यह मेरे गुरुजी की वाणी है, जो कि सुलतानपुर लोधी में सरकारी कर्मचारी के रूप में मोदी खाने के अधिकारी हैं तथा उन्हीं ने इस गरीब व्यक्ति की कन्या के विवाह हेतु दहेज की सब सामग्री आप से खरीदवाने भेजा है।  

यह सब जानकर, भाई मनसुख ने अपने हृदय में बसी शँका बताते हुए कहाः मैंने आज तक जो जाना तथा देखा है आप उस सबके विपरीत बता रहे हैं। मेरे अनुभव तो बहुत कड़वे हैं। क्योंकि मैंने आज तक जितने भी व्यक्ति धर्मकर्म करने वाले देखे हैं उनमें से कोई भी अपनी उपजीविका स्वयँ कमाता नहीं देखा बल्कि वह कर्म-काण्डी अधिक तथा धर्मी कम होते हैं। तब भाई भगीरथ जी ने कहाः आप ठीक कह रहे हैं परन्तु इस मानव समाज में जहाँ झूठ का प्रसार है वहाँ कहीं न कहीं अपवाद स्वरूप प्रकृति ने सत्य को भी बनाए रखा है। हाथ कँगन को आरसी क्या, आप प्रत्यक्ष दर्शन करके देखें। अतः भाई मनसुख जी गुरुदेव के दर्शनों के लिए भाई भगीरथ के साथ सुलतानपुर लोधी पहुँच गये। रास्ते में उन के हृदय में एक कल्पना उत्पन्न हुई कि मैं लाहौर से नानक जी के दर्शनों को चला हूँ यदि वह सर्वज्ञ हैं तो मेरा स्वागत करने के लिए मुझे ‘अहोभाग्य’ कहें तभी उन्हें मैं आध्यात्मिक गुरू मानूँगा। जब यह तीनों व्यक्ति नानक जी के निकट पहुँचे तब वह खाद्यान तुलवाने में व्यस्त थे। परन्तु उन्होंने तुरन्त सभी कुछ छोड़कर आगे बढ़कर स्वागत करते हुए कहाः आओ भाई मनसुख जी। यह सुनकर भाई मनसुख अति प्रसन्न हुआ तथा वह चरणों को स्पर्श करने के लिए झुके किन्तु गुरू जी ने उसे हृदय से लगा कर कहा, परमार्थ के रास्ते पर चलते समय मन में शँका नहीं रखते। यह सुन कर उसके नेत्रों से प्रेममय जल छलक आया। इस प्रकार यह गुरु-शिष्य का प्रथम मिलन बहुत भावुकता में हुआ। उन दिनों गुरू जी की दिनचर्या इस प्रकार थीः प्रातः अमृत बेला में वेईं नदी में स्नान कर सभी सँगीयों को साथ लेकर कीर्तन गायन करना, जिसे भाई मरदाना रबाब पर रागों की मधुर धुनों में बाँधता। इन सँगियों में अब नगर के प्रमुख लोग भी थे। धीरे-धीरे परमार्थ के अभिलाषी, गुरू जी के पास सँध्या के समय भी इकट्ठे होने लगे, जिससे दोनों समय सत्सँग होने लगा। प्रभु के गुणों के व्याख्यान सुनने दूर-दूर से सँगत आने लगी। इस सँगत रूपी वैकुण्ठ में भाई मनसुख जी भी आनंदित होने लगे तथा गुरुदेव के उपदेशों का अध्ययन करने लगे। कुछ दिन आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त कर भाई मनसुख घर को लौटने की आज्ञा माँगने लगे। गुरू जी ने उसे तीन सूत्री आदेश दियाः कृत करो, वण्ड के छको तथा नाम जपो। यानि, पुरुषार्थ कर के जीविका कमाओ, अर्जित धन सब मिलकर प्रयोग में लाओ तथा प्रभु चिन्तन-मनन में भी हृदय जोड़ो। तथा कहा बस यही सिद्धाँत तुम्हें भवसागर से पार करके, तुम्हारा कल्याण करेंगे। इसी पर दृढता से जीवन यापन करो।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 
     
     
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